Tuesday, November 01, 2011

हाथों की लकीरों पे, एतबार न मैं करता था...


बस!वो मेरे माथे की, लकीरों को पढता था ||


यादें ...वो ...जिनके साथ मैं चलता हूँ ....

(अपने बचपन के...!!! दोस्त इन्दर को समर्पित)
मेरा दोस्त , मैं और हमारा बचपन

मैं और मेरा दोस्त 
मैं और मेरा दोस्त 
मैं और मेरा दोस्त 

अशोक और इन्दर
और
इसके बाद वो खो गया...न मिलने के लिए ...

पुराने जख्मों से आज, फिर टीस निकल आई है
 अतीत झाड-पोंछ कर,मुझे फिर तेरी याद आई है |


 याद आ गया ,मिल के रूठना और मनाना वो
 बड़ी निकली रे जालिम ,तेरी यह जुदाई है |


 छोड़ के चल दिया ,साथ मेरा;अंजाने रास्तों पे
 तोड़ के अपने, वादे निकला;तू बड़ा हरजाई है |


 करता रहा उम्मीद, तुझसे मैं;भरपूर वफा की
 क्या कसूर?करी जो तुने;मुझसे ऐसी बेवफाई है |


जब भी उदास होता हूँ ,बस तुझे ही याद करता हूँ 
 याद करके तुझे ,आज फिर मेरी आँख भर आई है |


 मिसाल थी हमारी दोस्ती की, उन सबके वास्ते
 छोड़ मुझे "अकेला" करी दोस्ती की जग-हँसाई है |


अशोक'अकेला'








17 comments:

  1. खूबसूरत एहसास....
    उम्दा गज़ल सर,
    सादर...

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  2. यार चाचू, बहुत मार्मिक और हृदयस्पर्शी यादें हैं आपकी.
    दिल में गम और आँखें नम कर देतीं होंगीं.
    आपकी गजल में आपके आंसुओं की झलक दिख रही है मुझे.
    सुन्दर मार्मिक प्रस्तुति के लिए आभार.

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  3. पुराने जख्मों से आज, फिर टीस निकल आई है
    अतीत झाड-पोंछ कर,मुझे फिर तेरी याद आई है |
    bahut hi badhiyaa

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  4. साथ बिताये लम्हे याद आते हैं, स्मृतियाँ...

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  5. जुदाई तो सचमुच बड़ी कष्टदायक होती है .
    लेकिन पहले वो , फिर आप आगे निकल गए . :)

    मांफ कीजियेगा , ग़म की घड़ी में भी विनोद कर रहा हूँ .

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  6. क्या कहूँ अब... मन द्रवित हो गया. किसी अपने के बिछुड़ने का दर्द बहुत कष्ट करी होता है

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    छठपूजा की शुभकामनाएँ!

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  8. पुरानी गालियाँ ... बीती बातें ... कुज्रे हुवे किस्से और कुछ पुराने दोस्त .... कभी नहीं भूलते ... बेहतरीन गज़ल लिखी है ...

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  9. So touching! Congrats on writing such a nice post.

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  10. याद आ गया ,मिल के रूठना और मनाना वो
    बड़ी निकली रे जालिम ,तेरी यह जुदाई है |

    पर स्मृतियाँ कहाँ छूटती हैं ..

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  11. @ डॉ.टी.एस. दराल जी .

    आप जैसे डॉ.मिलना तो एक मरीज की खुशनसीबी है ....|
    आधी बीमारी तो आप की जिन्दा-दिली ही दूर कर देगी ,हा हा हा ..
    बस ऐसे ही खुश रहिए और खुश रखिए|
    आभार !

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  12. अपने दोस्त के यादगार चित्रों के साथ सुंदर रचना...भाव भीनी सुंदर पोस्ट,....
    मेरे नए पोस्ट में आपका स्वागत है...

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  13. .


    इस पोस्ट को कभी पढ़ कर गया था
    मन भारी हो गया था ,
    ज़्यादा आज भी नहीं कह पाऊंगा …


    प्रणाम है आपको …………………


    आपके मित्र को विनम्र श्रद्धांजलि !

    ReplyDelete
  14. शुक्रिया राजेन्द्र जी ,आप की संवेदनाओं के लिए !
    ये मुझे इ-मेल से प्राप्त हुई ,जो पोस्ट पे दिखाई नही दे रही थी ..
    न जाने क्यों ??
    Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार via blogger.bounces.google.com
    1:24 PM (21 minutes ago)

    to me
    Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार has left a new comment on your post "हाथों की लकीरों पे, एतबार न मैं करता था...":

    .


    इस पोस्ट को कभी पढ़ कर गया था
    मन भारी हो गया था ,
    ज़्यादा आज भी नहीं कह पाऊंगा …


    प्रणाम है आपको …………………


    आपके मित्र को विनम्र श्रद्धांजलि !



    Posted by Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार to यादें... at Tuesday, December 06, 2011 1:54:00 PM

    ReplyDelete
  15. .


    इस पोस्ट को कभी पढ़ कर गया था
    मन भारी हो गया था ,
    ज़्यादा आज भी नहीं कह पाऊंगा …


    प्रणाम है आपको …………………


    आपके मित्र को विनम्र श्रद्धांजलि !

    ReplyDelete
  16. खूबसूरत एहसास

    ReplyDelete

मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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