Saturday, March 10, 2012

जीवन की दौड़ .....मृत्यु की और ....


जीना भी एक बहुत बड़ा....... जुर्म है आखिर...... 
शायद ! इसी लिए हर शख्स को सज़ाए-मौत मिलती है ||
----अज्ञात   

एकाएक!!! 
वो 
एक दिन 
किसी के 
हाथों पर 
आ गया|| 

कस्मकाया 
कांपा
और 
धरती पर 
आ गया||

हिला, डुला
फिर रेंगा 
उठ खड़ा 
हुआ ,

चला ,डगमगाया 
लडखडाया ,
चलते-चलते 
भागने लगा||

तेज...तेज... 
...और तेज,
...फिर 
लडखडाया ,
डगमगाया ,
हांफने लगा|| 

रुक गया ,
गिर गया
लेट गया 
फिर किन्ही 
दो हाथों ने 
उठा लिया||

संभाल 
न सके,
कई हाथों 
ने उठा कर
चार कन्धों 
पर लिटा दिया||
...फिर 

ले चले 
अनजानी राहों पे... 
छोड़ दिया 
अँधेरी गुफ़ा में, 
रख दिया 

जलती ज्वाला पर||
एकाएक!!!
गायब हो
गया ...
कहाँ..?
जहाँ से 

एकाएक!!! 
आया था .........!
चित्र गूगल साभार 
अशोक'अकेला'

22 comments:

  1. यर्थाथ का चित्रण। सादर।

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  2. वाह !!!!
    सुन्दर शब्दों में सारा सफर लिख डाला .....

    बहुत खूब सर.
    सादर.

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  3. शास्वत का प्रभावी चित्रण...
    सादर.

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  4. आज के यथार्थ का सार्थक सटीक चित्रण,बेहतरीन प्रस्तुति.......

    MY RESENT POST ...काव्यान्जलि ...:बसंती रंग छा गया,...

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  5. जीवन सफ़र को बहुत खूबसूरत शब्दों में पिरोया है .
    यह जीवन चक्र यूँ ही चलता है . बस रह जाती हैं तो यादें --कर्मों की .

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  6. जीवन चक्र का सटीक चित्रण्।

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  7. माटी का पुतला ...एक दिन माटी में मिल गया

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  9. हाथों पर आया, कान्धों पर जाता है..

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  10. हाड़ जारे ज्यों लाकड़ी ,केश ज़रे ज्यों घास ,

    सब जग ज़रता देख के ,कबीरा भया उदास .

    तूने खूब रचा रे भगवान्, खिलौना माटी का ,

    जिसे कोई न सका पहचान, खिलौना माटी का . अ

    कहाँ से आया है तू कहाँ तुझे जाना है ,

    सब कुछ एक पहेली है दादा,....अच्छी पोस्ट दर्शन खंगालती सी ....

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  11. satya ki prastbhoomi par jivan ...satya ko sarthak karati kavya prastuti

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  12. ये तो जीवन का शाश्वत सच है ... जो आया है उसे जाना है ... इसे सजा कहो या मुक्ति ... जिंदगी के जुर्म की सजाये मौत या आत्मा को जिस्म की कैद से आज़ादी ...

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  13. ji yahi kdwa saty hai ....

    bda ajib hai ye silsila ...khas kar budhapa to bahut hi kashtdayak hota hai ...
    kuchh din pahle imroz ji bhi yahi kah rahe the ki kam se kam budhape ki kashtmay zindagi mein to man chahi mout ka hak hona chahiye ....

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  14. चंद लाइनों में पहाड़ सा जीवन बांध दिया आपने , यही है जीवन कटु सत्य , इंसान खामख्वाह "में" के बोझ को उठाये घूम रहा है

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  15. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    इंडिया दर्पण की ओर से शुभकामनाएँ।

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  16. बहुत बढ़िया जीवन का यथार्थ प्रस्तुति करती गहन अभिव्यक्ति....रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

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  17. स्नेह के लिए आप सब का दिल से ...
    आभार!
    आप सब खुश और स्वस्थ रहें!

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  18. कैसा है यह चक्र , कैसी पहेली !

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  19. बहुत खूब !
    जीवन का सत्य चित्रण

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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