Tuesday, April 03, 2012

अज़नबी शहर के,अज़नबी रास्ते...

मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे!!!


यादों....के अपने झरोखे से आज,राजस्थान 
के इन हुसैन बंधुओ को सुनना अपने आप 
में सुकून की बात है| इन बंधुओ की जुगल-बंदी 
भी अपने आप में एक मिसाल है|


ये भाई ज्यों-ज्यों अपने गीत,गज़ल सुनाते जाते हैं,
सुनने वाला इनके साथ-साथ उसी, गजल के अल्फाजों 
के मूड में ढलता जाता है....


एक अज़नबी, शहर ,अज़नबी, शहर की अज़नबी
सडकें ,अँधेरी रात का सूनापन और तन्हा रास्ते 
सड़क के दोनों किनारों पर ,जलती मद्धम दूर तक 
नज़र आती रौशनियाँ ....


और उनके बीच चलता एक अकेला  अज़नबी
मुसाफ़िर,अपनी अन्जान मंजिल की तलाश में !!!
तब कोई अपना याद आ जाता है और दिल से 
ये आवाज़ निकलती है ..... 


अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे....   
मैं बहुत दूर तक यू ही चलता रहा 
तुम बहुत देर तक याद आते रहे |


अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे....

कल कुछ ऐसा हुआ ,मैं बहुत थक गया 
इस लिए सुन के भी अनसुनी कर गया 
कितनी यादों के भटके हुए कारवाँ 
दिल के जख्मों के दर खटखटाते रहे


अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे....

जहर मिलता रहा ,जहर पीते रहे 
रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे 
जिन्दगी भी हमें आज़माती रही 
और हम भी उसे आजमाते रहे 


अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे....

सख्त हालात के तेज़ तूफ़ान में 
घिर गया था हमारा ज़नूने वफ़ा.
हम चिरागे तमन्ना जलाते रहे 
वो चिरागे तमन्ना बुझाते रहे 


अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
मेरी तन्हाई पर  मुस्कराते रहे....
उस्ताद अहमद हुसैन ,उस्ताद महोमद हुसैन 




22 comments:

  1. वाह!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    बड़े दिनों बाद सुना हुसैन बंधुओं को.....

    जहर मिलता रहा ,जहर पीते रहे
    रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
    जिन्दगी भी हमें आज़माती रही
    और हम भी उसे आजमाते रहे
    --लाजवाब शेर......
    आपका बहुत शुक्रिया सर
    अनु

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    Replies
  2. तुम बहुत दूर तक याद आते रहे।

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  3. यादों....के अपने झरोखे से आज,राजस्थान
    के इन हुसैन बंधुओ को सुनना अपने आप
    में सुकून की बात है| इन बंधुओ की जुगल-बंधी
    भी अपने आप में एक मिसाल है|

    कृपया 'जुगल -बंदी 'कर लें जुगल -बंधी को .बढ़िया ग़ज़ल सुनवाई आपने .

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  4. अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
    मेरी तन्हाई पर मुस्कराते रहे....
    बहुत बढ़िया गजल सुंदर बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

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  5. अज़नबी शहर के अज़नबी रास्ते ,
    मेरी तन्हाई पर मुस्कराते रहे....
    मैं बहुत दूर तक यू ही चलता रहा
    तुम बहुत देर तक याद आते रहे |
    ... bahut hi khoobsurat se ehsaas

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  6. वाह बेहद खूबसूरत हैं ये यादे
    कुछ अपनी ,कुछ पराई सी ||

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  7. जहर मिलता रहा ,जहर पीते रहे
    रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
    जिन्दगी भी हमें आज़माती रही
    और हम भी उसे आजमाते रहे
    बहुत ही बेहतरीन...

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  8. वाह उस्ताद !
    बहुत सुन्दर जुगल बंदी .

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  9. कल कुछ ऐसा हुवा मैं बहुत थक गया ...

    क्या बात है अशोक जी ... आप भी इनके दीवाने हैं हमारी तरह ...
    सुभान अल्ला ... मन कर रहा है शुरू कर दू इनकी सी दी अभी ही ... पर क्या करूं ... अभी ऑफिस में हूँ ...

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  10. आपकी पोस्ट कल 5/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा - 840:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  11. हुसैन बंधुओं का बचपन से मुरीद रहा हूँ। पर इस ग़ज़ल को मैंने पहले नहीं सुना था। शुक्रिया इस ग़ज़ल से रूबरू कराने के लिए।

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    Replies
    1. शुक्रिया मनीष जी,
      मेरी यादेँ आप को कुछ दे सकी! खुशी हुई !
      मैंने बहुत से शामें ...आप के नाम करी है और करता हूँ |
      खुश रहें और स्वस्थ रहें !

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  12. husaen bandhuon ki maen 30 varshon se prashansak rhi hun aapki yadon ko slam ki hamesha kuchh de jatin haen,Thanx.

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  13. गाईये गणपति जगवंदन... याद आ गया ।

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  14. हुसैन भाइयों को मैं बचपन से सुन रही हूँ ... उनकी पहले एल्बम 'गुलदस्ता ' मेरी आज भी पसंदीदा है ... और मैं बहुत खुशनसीब हूँ .... की मुझे उनसे मिलने का मौका भी मिला ... कुछ साल पहले वो शिमला आये थे .... तब वो पापा के साथ हमारे घर पधारे ... उनकी सादगी और उनका व्यक्तिव बेमिसाल है ... उनकी 'श्रधा ' एल्बम भी मुझे बहुत पसंद है ... ये पोस्ट डालने के लिए आका धन्यवाद .. बहुत से यादें ताज़ा हो गयी .... :)

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  15. बढ़िया प्रस्तुति के लिए शुक्रिया .

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  16. कल 30/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  17. बहुत सुंदर ... आभार इसे सुनवाने के लिए

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  18. राही मासूम रज़ा की यह ग़ज़ल अशोक खोसला की आवाज़ में सुनी थी। हुसैन बंधुओं का अपना अलग अंदाज़ है..

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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