Sunday, December 18, 2011

यादें .......फिर इंतज़ार... फिर यादों के साथ इंतज़ार...

.....इंतज़ार के बाद फिर यादें ........
ये सिलसिला बस यू ही चलता रहता है ....!!!
और आज अपनी यादों को  साँझा कर रहा हूँ ..
आप सब के साथ शायर "ज़नाब नासिर काज़मी
और गुलूकारों के बादशाह ज़नाब गुलाम अली साहब "की
मीठी ,मदमस्त और रूहानी आवाज़ का सहारा लेकर ....
तो आप भी सुनिए ....उनकी रूहानी आवाज़ में ये सुहानी
यादें ....जी कभी न कभी हम सब के दिलों में भी यादों के
रूप में उभरती है .जिन्हें याद करने को दिल करता है ,याद
आने पर दिल में एक मीठी से कसक ,हुक ,बेचैनी और एक
मस्ती भरा सुकून सा मिलता है .....???
चलिए ,सुनते हैं एक सुकून भरी मीठी  आवाज में एक गज़ल|
और डूब जाइए अपनी मीठी यादों में .........

       फिर सावन ऋतु की पवन चली ,तुम याद आए 
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी ,तुम याद आए||


फिर कागा बोला ,घर के सुनें आँगन में 
फिर अमृत-रस की बूंद पड़ी ,तुम याद आए ||


फिर गूंजे बोली ,घास के भरे समंदर में 
ऋतु आई पीले फूलों की ,तुम याद आए ||


दिन भर तो मैं दुनियां के धंधों में खोया रहा 
जब दीवारों से धूप ढली ,तुम याद आए || 


फिर सावन ऋतु की पवन चली ,तुम याद आए 
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी ,तुम याद आए||


ज़नाब गुलाम अली साहब  
शायर: नासिर काज़मी 

17 comments:

  1. याद आने की यादें ही आती रहीं,
    अपने में मगन गुनगुनाती रहीं,
    तुम नहीं थीं, तुम्हें पूर्ण अनुभव किया,
    कैसे कह दूँ कि यादें सताती रहीं।

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  2. वाह अशोक जी ।
    सुबह सुबह ग़ुलाम अली की सुरीली आवाज़ सुनकर मज़ा आ गया ।

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  3. दिन भर तो मैं दुनियां के धंधों में खोया रहा
    जब दीवारों से धूप ढली ,तुम याद आए '
    सुबह सुबह गुलाम अली साहब की मखमली आवाज़ मे इस गजल को सुनकर मन खुश हो गया.
    शानदार पसंद है आपकी.कुछ सूफियाना कलाम सुनाइये....ऐसा कि वो पास होने का अहसास देने लगे और छू ले.'उसे' पाने का एक मात्र जरिया यही है मेरा.आँखें मूँद कर सुनती रहूँ बस.
    और..आप स्वस्थ रहे.लम्बी उम्र हो आपकी भाई अभी बीस पच्चीस साल आपकी पसंद सुन्नी है मुझे वीरा!

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  4. आनंद आ गया सर, सुनकर...
    सादर आभार...

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  5. गुलाम अली की आवाज में वो जादू है कि हर लब्ज जीवित हो उठता है, जब गाते हैं पवन चली....तो सचमुच ही हवा के चलने का एहसास होने लगता है, वाह !!! गजब का गीत सुनाया है आज...

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  6. बढ़िया प्रस्तुति सलूजा साहब !

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  7. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  8. यादें यादें यादें ... शायद ये मौत के साथ ही खत्म होती हैं ... और जब तक जिंदगी होती है ... कोई इन्हें छोडना भी तो नहीं चाहता ...
    सुबह सुबह ... गुलाम अली और लाजवाब गज़ल ... माहोल बना दिया आपने ...

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  9. फिर सावन ऋतु की पवन चली ,तुम याद आए
    फिर पत्तों की पाज़ेब बजी ,तुम याद आए||
    .इस उपवन में महक उठी ,तुम याद आये .बेहतरीन रचना और बंदिश .

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  10. फिर कागा बोला ,घर के सुनें आँगन में
    फिर अमृत-रस की बूंद पड़ी ,तुम याद आए ||


    फिर गूंजे बोली ,घास के भरे समंदर में
    ऋतु आई पीले फूलों की ,तुम याद आए ||


    दिन भर तो मैं दुनियां के धंधों में खोया रहा
    जब दीवारों से धूप ढली ,तुम याद आए ||

    फिर सावन ऋतु की पवन चली ,तुम याद आए
    फिर पत्तों की पाज़ेब बजी ,तुम याद आए||

    कोमल पदावली कोमल भाव का मीठा गीत .आभार आपकी ब्लोगिया दस्तक के लिए अशोक भाई .आपके स्नेह्रूप प्रोत्साहन के लिए .

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  11. Very Nice post our team like it thanks for sharing

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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