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Sunday, April 22, 2012

हैं सबसे मधुर वो गीत ,जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं ....

जब हद्द से गुज़र जाती है खुशी ,आँसू भी छलकते आते हैं!!!

यादेँ.....१९५३ की ...उम्र सिर्फ ११ वर्ष ,खेलने ,कूदने ,खाने-पीने और पढ़ने के दिन ....
मगर गीत ऐसे पसंद ...क्यों ..पता नही ...शायद तलाश... किसी से अपनेपन की ....
तलाश ज़ारी है ....आज भी .....

आज अपनी पसंद का... ये गीत आप सब को सुनवा भी रहा हूँ और दिखा भी...
तलत साहब की मखमली आवाज़ में बक्शा ये गीत आज भी जख्मी दिलों पर 
मरहम का काम करता है जैसा मेरे बालपन में ....दुःख भरी अँधेरी रात के बाद 
आने वाली आशाओं से भरी सुबह का सन्देश देता है .....

११ साल की उम्र में भी इस गीत को सुन कर मेरा बालसुलभ मन आशाओं से 
भर जाता था ,चेहरा खुशी से खिल उठता था ..दिल में उमंगों का संचार हो 
जाता था .....आज भी सुनता हूँ तो सुकून से लबरेज़ हो जाता हूँ ......

ब्लागजगत के तनावभरे आज के माहौल में फिर इस गीत को सुना और आप को भी 
सुनाने का दिल चाह तो सुनवा रहा हूँ ......इस उम्मीद ,और इस भावना के 
साथ कि ये सब के दिल को सुकून देगा और आने वाले कल का  खुशियों भरा
और भाईचारे का सुंदर सन्देश भी ......


पहलू में पराये दर्द बसा के 
तू हंसना-हँसाना सीख ज़रा
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे
हम प्यार के दीप जलाते हैं...  


जब गम का अँधेरा घिर आए ,
समझो के सवेरा दूर नही 
हर रात का है पैगाम यही 
तारे भी यही दौहराते हैं ..... आगे ....

वर्ष :१९५३ 
फिल्म: पतिता 
गीत: शैलेन्द्र 
संगीत: शंकर-जयकिशन 
गायक : तलत साहब 
कलाकार: देव आनंद और उषा किरण  
अगर देखने में कोई दिक्कत आ रही है ...
 तो आप यहाँ इसे सिर्फ सुन सकते हैं ...
आप सब खूब खुश और स्वस्थ रहें.....
 शुभकामनाएँ!

Saturday, January 14, 2012

हसीन ख्वाब में, एक हसीं मुलाक़ात....


"टूटा हुआ फूल खुश्बू दे जाता है 
बीता हुआ पल यादें दे जाता है 
हर किसी का अंदाज़ होता है अपना 
कोई ज़ख्मो पे प्यार तो कोई प्यार 
में जख्म दे जाता है "|


यादों के पिटारे से ....लाया हूँ .मैं आप के लिए
एक हल्की-फुलकी ,दिल को सहलाती ,सुकून
देती,अपने प्यार को पुकारती....
एक दिलकश रोमांटिक ,छोटी सी गजल ,
प्यार में डूबी ,मदहोश करती दिल को
लुभाती ,रफी साहब की गुनगुनाई मीठी
आवाज़ में ...
वर्ष : १९५६
फिल्म : राज हठ
गायक: रफ़ी साहब
संगीत : शंकर-जयकिशन
गीतकार : हसरत जयपुरी
कलाकार : प्रदीप कुमार .मधुबाला

आए बहार बन के लुभा कर चले गए
क्या राज़ था जो दिल में छुपा कर चले गए


कहने को वो हसीन थे आँखें थीं बेवफा
दामन मेरी नज़र से बचा कर चले गए


इतना मुझे बता दो मेर दिल की धड़कनों
वो कौन थे जो ख़्वाब दिखा कर चले गए


आए बहार बन के लुभा कर चले गए
क्या राज़ था जो दिल में छुपा कर चले गए ||









Saturday, November 05, 2011

आइए....मेहरबां ,बैठिए जाने-जां....


शौक से लीजिए जी .....इश्क के इम्तहाँ...


"कभी कभी ऐसे भी गुन-गुना लेना चाहिए 
हो मौसम सुहाना तो मुस्करा लेना चाहिए"

यादें .... आज आप को सुनवाता हूँ....
अपने.... (और मेरे) समय का एक खूबसूरत चुल-बुला गीत 
जो अपनी मद-होश ,मस्त आवाज़ में गाया है!
आशा जी ने| 
और जिसको सिनेमा के पर्दे पर साकार किया है ...
अपने समय की सबसे खूबसूरत ,शोख और चंचल 
अदाकारा मधुबाला जी ने...
इस गीत में मधुबाला जी ने जिस खूबसूरती से अपनी 
मदमस्त आँखों से और अपनी दिलकश मुस्कान से अपने 
चाहने वालों को बैठने और इश्क का इम्तहाँ लेने का 
न्योता दिया है ....वो बस देखने और सुनने से ही तआल्लुक़
रखता है ....तो आप भी देखिए,सुनिए और कुछ देर के लिए 
खो जाइये अपनी गुज़री सुहानी यादों में ..... 

फिल्म: हावड़ा ब्रिज 
वर्ष: १९५८
संगीतकार : औ.पी.नैयर
गीतकार: कमर जलालाबादी 
आवाज़ : आशा जी 
सह:कलाकार : अशोक कुमार ,के एन सिंह आदि 

Sunday, September 18, 2011

अपनी किस्मत!!! ही कुछ ऐसी थी के ; दिल टूट गया ....


यादें ... अपनी गुज़री यादों के      
झरोखे से !!!

मेरे संगीत प्रेमियों को मेरा
प्यार भरा नमस्कार ......
आइए, हम संगीत की 
महफ़िल  सजाते हैं| 
अपना और सुननें  वालों 
का दिल बहलाते हैं ...

वो तेरे प्यार का ग़म ,
इक बहाना था सनम 

मुकेश जी इस गीत में न जाने 
कितने टूटे दिलों की दास्तान 
बयां कर रहे है ....
अपनी दर्द भरी आवाज़ में ....

यह भूत, वर्तमान और भविष्यकाल के टूटे 
दिलों की आवाज़ थी, है और होगी ....???
आइए हम सब मिल के सुनतें हैं ...
और ढूंढते है अपने-अपने दिल की
आवाज़....
अभी पिछले महीने २७ अगस्त को 
मुकेश जी की पुण्य तिथि थी ....
हम सब की ओर से एक विन्रम 
श्रदांजलि.....
मुकेश जी 













फिल्म: My Love
 वर्ष: १९७०
 संगीतकार : दान सिंह जी
 गीतकार: आनन्द बक्शी जी
स्वर: मुकेश जी
 पर्दे पर : शशि कपूर जी
 सह-नायिका : शर्मीला टेगोर जी

और अंत में :-
एक प्यार देने वाला शक्स
हर दर्द की दवा होता है, 
पर ऐसे दर्द की दवा कहीं नही
जो प्यार करने वाला देता है ....

Monday, August 15, 2011

जवानियाँ ये मस्त-मस्त बिन पीये,जलाती चल रही हैं ,राह में दीये......

शम्मी जी 
पिछले काफ़ी दिनों से तबीयत ठीक नही चल रही ....

पर आज अपने युग के विद्रोही कलाकार का दुखद निधन 
का टी.वी.पर समाचार सुन कर रहा नही गया |
और जिन्दगी की खूबसूरत गुज़री यादों ने घेर लिया...
और वो पुराने अपने ज़वानी, में रखते कदम के वक्‍त की यादें 
ताज़ा हो गई.... 
यादें ....शम्मी कपूर की ....
यादें ... अपने जवां होने की ...
यादें ... उस अपनी पीढ़ी की... 
यादें ... उस जंगली ,जानवर, बदतमीज,ब्लफ़-मास्टर,पगला कहीं का के प्रोफेस्सर की ...
यादें ... उस जैसे मद-मस्त,मस्त-मौला,लापरवाह विद्रोही ब्रह्मचारी की ...
कोई शक ...बिना शक हमने तो आज तक तुम सा नही देखा ....
मेरी और मेरी पीढ़ी की और से एक भाव-भीनी विन्रम 
श्रद्धांजलि....
फिल्म: तुम सा नही देखा|
वर्ष : १९५७ 
गायक : रफ़ी साहिब 
गीतकार; मजरूह सुल्तानपुरी
पर्दे पर: शम्मी कपूर और अन्य
साथी अभिनेत्री: अमीता 
मेरी पसंद..
मैं(१९५७ में)

.

अशोक सलूजा 

Wednesday, July 20, 2011

आज सजन मोहे अंग लगा लो ....

जन्म सफ़ल  हो जाये|

ये सन्देश है ...वहीदा रहमान का गुरु दत्त जी के लिए ...
काश! ये सच होता ...तो गुरु दत्त जी आज हमारे बीच भी 
हो सकते थे ...पर मजबूरियां कभी समझोता नही करने देतीं ..
.
वर्ष: १९५७ 
फिल्म: प्यासा 
गायिका : गीता दत्त 
संगीत : सचिन देव बर्मन 
शब्द :  बंगाली Baul...
कलाकार: गुरु दत्त,वहीदा रहमान आदि...

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी ,
वरना यूँ तो कोई बेवफ़ा नही होता ...

Sunday, July 17, 2011

रफ़ी साहिब की पुकार ... सावन के महीने में ...?


ये पिछली पोस्ट का दूसरा हिस्सा ...
खुशनुमां माहौल में ...
मुझे दुःख है ...इसका वीडियो इसके गीत
जैसा अच्छा नही ....मज़बूरी है ...

पर्दे पर देव आनंद साहिब की जुबानी,अपनी मस्त
अठखेलियों के साथ ,एक शराबी के अभिनय  में!
ये पूरा गीत एक शराबी के खुशनुमां मूड में ...

इस गीत को शब्द दिए :राजेन्द्र कृष्ण जी ने
संगीत से सजाया : मदन मोहन जी ने
स्वर दिया : रफ़ी साहिब ने
फिल्म : शराबी
वर्ष : १९६४
तो आयें मिल के सुनते हैं ...हम सब !



Saturday, July 02, 2011

आंसू भरी है ...ये जीवन के राहें कोई उनसे कह दे, हमें भूल जाएँ !


मेरी यादों के गुलदस्ते से.... एक सदाबहार महकता फूल ...
इन यादों को याद करके ...अपनी भूली यादों का अतीत याद 
आता है ...
आज एक बार फिर आप को 'परवरिश' फिल्म से ही एक 
मुकेश जी की गाई,और फ़िल्मी परदे पर राज कपूर जी 
द्वारा अभिनय से अभिनीत कर सुनवाई गई 'ग़ज़ल ' से 
रूबरू करवाता हूँ |
जिसमें राज कपूर साहिब ,अपने ग़मग़ीन अंदाज में ,दर्द 
में डूबी इस 'ग़ज़ल ' में अपनी महबूबा से ,अपने को 
भूल जाने की नाकाम फ़रियाद कर रहें हैं |
तो सुनियें उनकी दर्द में डूबी फरियाद : 

वर्ष : १९५८ 
फिल्म : परवरिश 
पर्दे पर: राज कपूर 
सह-कलाकार : माला सिन्हा 
गायक: मुकेश जी 
संगीतकार: दत्ता राम 
गीतकार : हसरत जयपुरी

मुकेश जी :

Saturday, June 18, 2011

किस, जगह जाएँ ...किस को दिखलायें ...जख्में दिल अपना ...


मेरी यादों के...  गुलदस्ते से एक सदाबहार महकता  फूल ...
..आज मैं खोज़ के लाया हूँ ,एक three-in- one
flavored ice cream cone , जिसे पा कर आप का मन...खुशी, गम् और
दर्द तीनों का एहसास करेगा |
ये आशा भोंसले जी की आवाज में है ,पर इसका वीडियो पाने में ,मैं
असमर्थ रहा | पर मेरा आप से वादा है कि इसे सुन कर आप को
कोई मायूसी नही होगी | सोने से पहले ,आँखे मूंद कर एक शांत
माहौल में सुनें | ये आप को आप के अतीत की यादों में ले जायेगा ,
और मेरा ...मानना है कि अतीत कि यादें हमेशा सुकूं देती है |
चाहे उन यादों में दर्द का समावेश ही, क्यों न हो|
पर एहसासों को महसूस करने कि जरूरत तो है ही... 
तो सुनिये ...फिर गिला-शिकवा बाद में सही ...

फिल्म : लाइट हाउस-१९५८
फिल्म : ठोकर - १९५३




(अगर आप को ...अच्छा लगे तो मैं इसका आडियो फाइल आप को ई-मेल 
कर सकता हूँ ) अशोक सलूजा 

Monday, June 13, 2011

मेरी यादों के... गुलदस्ते से एक सदाबहार महकता फूल ...


मस्ती भरा है समां...हम तुम हैं दोनों यहाँ ...

आज मैं आपको एक राज़ की बात बताता हूँ ...पर बता दिया 
तो राज़ काहे का ...? पर नही आज मैं बता के ही  रहूँगा कि मैं अनपढ़ 
क्यों रह गया,,?  मेरे पास शब्दों की  कमी क्यों है..? 
अब जो बच्चा... नही; किशोर जब १६ साल कि उम्र में और 
दसवीं क्लास में पढाई के बदले ऐसी-ऐसी तुकबन्दी करेगा 
तो वो दसवीं क्लास से आगे कैसे बड़  सकता है...???

अशोक सलूजा 
सुस्ती भरा हैं समां..ssss
पढ़ने का मूड नही यहाँ..sss
हम तो चले बाहर,
तुम भी आ जाओ, 
जलवे दिखाऊँ वहाँ..sss
सुस्ती भरा है समां ..sss 

इस लिये मेरे साथ तो, ये होना ही था और हुआ |
और शब्दों की कमी भी होनी थी...तो इसमें हैरान या 
परेशान होने की तो कोई बात ही नही रही न... ? 
पर एक बात तो आप सब को माननी ही पड़ेगी कि
मेरे तुकबन्दी के एहसास तो तब भी थे और आज भी 
हैं |
आज मैं आपको १९५८ का वो गीत सुनवाता हूँ जिसकी 
मैंने पैरोडी का सैम्पल उपर दिया है| पैरोडी तो पुरे गाने 
की बनाई थी और सारी क्लास बड़े शौक से सुनाने की
फरमाइश भी करती थी | पर अब ये सब गुज़रे ज़माने 
की बात है...

आज! मुझे पता है ,इस पर व्यंग भी कसे जायेंगें ,टीका-टिप्पणी 
भी होगी ...पर तो क्या ...? झूठ से तो सच्चाई बेहतर है ,कई 
झूठ बोलने से तो बच जाऊंगा |अब बुद्धिजीवियों से खुल कर कुछ 
सीखने को भी मिल जायेगा | जो कहा सच कहा ,सच के 
सिवा कुछ नही |

बात १९५८ ,जून महीने की है ,गर्मियों के छुट्टी में मैं कश्मीर, 
श्रीनगर में था| वहाँ मैने ये फिल्म परवरिश देखी थी |
यानि आज से ठीक ५३ साल पहले ...१६ साल की उम्र में,
और आज मैं ७० वें साल में हूँ | उस उम्र में ऐसा ही होता 
है ,मेरे आभासी रिश्तों के  भाई.बहनों और बच्चों ...थोड़ी मस्ती, 
थोडा प्यार और थोडा रोमांस ...बस फिर जिन्दगी भर दुनियादारी 
और काम ही काम, जो आज तक जारी है ...
तो सुनिये ये सदाबहार मस्ती भरा गीत ...
वर्ष : १९५८ 
फिल्म : परवरिश 
पर्दे पर: राज कपूर ,माला सिन्हा 
गायक/गायका: मन्ना डे और लता जी  
संगीतकार: दत्ता राम 
गीतकार : हसरत जयपुरी

Thursday, June 02, 2011

राज किरण नाम का अभिनेता याद है आपको ...?


क्या कहा "नही" तो नीचे देखिये ,सुनिए ...फिर बात करतें हैं ,
उसके बारे में ....
जगजीत सिंह 
 <

फिल्म : अर्थ
 वर्ष : १९८२
 संगीतकार और गायक :जगजीत सिंह
 गीतकार: कैफी आजमी 
पर्दे पर : राज किरण,शबाना आजमी

 तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
 क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो
 क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो
 तुम इतना जो .....

 सुना आप ने ... राज किरण को भी देखा और पहचाना होगा शबाना आजमी के साथ ... इसी राज किरण अभिनेता ने पुरानी फिल्म सुभाष घई की क़र्ज़ में ऋषि कपूर के पूर्व-जन्म का किरदार निभाया था | अगर आप ने 'क़र्ज़ ' देखी होगी तो याद आ गया होगा ... इस राज किरण अभिनेता ने अपने अभिनय से इस गीत को जगजीत सिंह की आवाज में पर्दे पर साकार किया और हम सब देखने वालों का अपने सशक्त अभिनय से मनोरंजन किया | क़र्ज़ के अलावा और भी कुछ फिल्मो में काम किया...
...फिर इनके वक्त ने पलटा खाया , अपने निजी कारणों से फ़िल्मी दुनिया से गायब हो गये ... और एक दिन सब ने सुना ...वो इस दुनियां में नही रहे... कुछ इनके खास चाहने वाले फ़िल्मी दोस्तों को ये बात पचा पाने में मुश्किल हो रही थी | जिनमें से एक ऐक्ट्रेस दीप्ति नवल जी ने पिछले दिनों फेस-बुक पर अपनी पोस्ट डाल कर पता लगाने की कोशिश करी ,पर कामयाबी नहीं मिली
 ... आखिर दोस्तों की मेहनत रंग लाई...और १,जून २०११ के टाइम्स आफ इंडिया के, पेज-१३ और    दिल्ली टाइम्स ,पेज नम्बर -१२ पर ये खबर विस्तार-पूर्वक छपी है |आप चाहें तो इसको पढ़ सकते है, उसी दिन इसकी न्यूज़ एन. डी. टी.वी .पर भी सुबह ११ बजे दी गयी थी | इस समय अभिनेता राज किरण .अपनों से दूर... यहाँ तक कि अपनी बीवी और लडके से भी दूर या यूँ कहें इन सब का छोड़ा हुआ,त्यागा हुआ,इनकी बेरुखी से हारा और अपने बुरे वक्त का मारा...Atlanta, U.S.A. के Mental hospital में इलाज करा रहा है |
 कौन जाने, कितने साल...बीत गये इन दुखो में ...क्यों और कैसे .??? इनको ढ़ूढ़ने का सारा श्रय श्री ऋषि कपूर जी को जाता है | वो आगे भी राज किरण के लिये बहुत कुछ करने की सोच रहें है | राज किरण जी ने अपने अभिनय से अपने देखने वालों का जितना भी मनोरंजन किया है ...उसके बदले हम सब, उनकी अच्छी सेहत और अच्छे भविष्य के लिये शुभकामनाएँ तो दे ही सकतें है..न ? तो मेरे साथ आप सब भी दीजिए !
 शुभकामनाएँ ! 
शुक्रिया ! 
आप सब खुश रहें ,स्वस्थ रहें | 
अशोक 'अकेला'

Monday, May 30, 2011

मेरी यादों के... गुलदस्ते से एक सदाबहार महकता फूल ...सिर्फ आप के लिए ...

अरुण कुमार निगम जी ने कहा ....
कभी मन बेचैन हो जाता है तो इस गीत को आँखें बंद करके बांसुरी पर छेड़ लेता हूँ.आपके पास अनमोल संग्रह है .यदि संभव हो तो मुकेश जी का गीत-हिया जरत रहत दिन-रैन हो रामा(फिल्म-गोदान) सुनवाइयेगा .आभारी रहूँगा.मेरे पास आडियो कलेक्शन में 
था.कैसेट डैमेज हो गया है.आपके टेस्ट पर इत्मिनान से लिखूंगा
अरुण जी ,आप का मनचाह गीत ,देखने,और सुनने के लिये हाज़िर है ....
सुनिए और खुश रहिये | आप की पसंद...हिया जरत रहत दिन रेना ...
वर्ष : 1963. फिल्म: गो-दान
 पर्दे पर: राज कुमार
 स्वर: मुकेश जी
 संगीत:पंडित रवि शंकर जी
 गीतकार: अन्जान
 सहकलाकार : कामिनी कौशल 
अशोक 'अकेला'

Tuesday, May 24, 2011

मेरी यादों के... गुलदस्ते से एक सदाबहार महकता फूल ...सिर्फ आप के लिए ...

अशोक सलूजा 
मेरी पसंद ... आप भी सुनें ...!!!
चाँद फिर निकला ...मगर तुम न ...
 वर्ष : १९५७ 
 फिल्म: पेइंग गेस्ट
 पर्दे पर: नूतन जी 
 स्वर: लता जी
 संगीत: एस.डी. बर्मन साहिब
 गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी जी
 सहकलाकार :देव आनन्द जी


 तो आयें सुनते हैं ...और तब तक सुनते रहें... जब तक आने वाला,.. आप के पास न आजाये,और फिर सकूँ से सो जाएँ ...शब्बा खैर...
 ...

Saturday, May 21, 2011

न हँसो ,हम पे जमाने के हैं,ठुकराए हुए... दर-ब-दर फिरते है ,तकदीर के बहकाए हुए...


 आज... याद करतें हैं,अपने गुज़रे  पुराने दिनों को |
आज मैं, आप को वो गज़ल  सुनवाऊंगा जो मेरी किशोरावस्था की है |
येह गज़ल १९५७ की  है ,जब मैं १५ साल का था |तब येह पिक्चर 
मैंने देखी थी ... नाम...Gateway of India ...पर्दे पर अपने समय की, 
सबसे खूबसूरत अदाकारा ,मधुबाला जी ने इस गज़ल को  पेश किया है |
खूबसूरत आवाज: लता जी की ,खूबसूरत संगीत: मदन मोहन जी का| 
और खूबसूरत शब्दों से सजाया है;राजिंदर कृष्ण जी ने |
हाँ, पिक्चर बनाई थी ओम प्रकाश जी ने |
पिक्चर के बाकी अदाकार थे : भारत भूषण ,प्रदीप कुमार और ओम प्रकाश जी, खुद | इस पिक्चर के सारे गाने बेहतरीन थे और आज भी हैं |
पर मुझे तब भी और अब भी येह गज़ल सबसे ज्यादा पसंद है |
आप भी सुनें, मेरी पसंद! शायद...आप को भी पसंद आये ...हाँ एक बात और 
येह गज़ल पिक्चर के बाकी गीतों में से सब से कम सुनी गई है |
पर मुझे आज भी सबसे ज्यादा यही गज़ल पसंद है | पसंद ...अपनी अपनी ...

गज़ल के बोल हैं : न हँसो ,हम पे जमाने के हैं,ठुकराए हुए 
 दर-ब-दर फिरते है ,तकदीर के बहकाए हुए...
अशोक"अकेला"


Saturday, May 07, 2011

या दिल की सुनो .... दुनियां वालो ...

या मुझ को अभी चुप रेहने दो .....


जब बीती यादें ,याद आती हैं ...तो हेमंत जी का गाया येह गीत 
मेरी जुबां बन जाता है ... 


"छाई है हर तरफ़ खामोशी,
सकूं का आलम है  सब
न रही कहीं कोई आरजू
    न कही कोई बेचेनी है अब"।   
अशोक "अकेला "

Friday, April 08, 2011

किसी की मुस्कराहटो पे हो निसार ...



















किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार ......
अन्ना की तरफ से .....हम सब भारतवासियों को ....
जो बयां के बाहर है ... सुनियें और एहसास के साथ 
बस मेहसूस कीजिये!!!!!!!!!



Wednesday, February 02, 2011

दुःख बोल के जे दास्या ते ...


नमस्कार...कैसे हैं आप लोग! सब ठीक -ठाक
खुश रहिये |

मैं कैसा हूँ? अरे भाई ! अब हम जैसे लोगो का किया ?
बस समय काटना चाहते हैं -सो कट रहा है ?

"सब पूछते हैं मुझसे ,कहो कैसे कट रही है 
कोई नही पूछता कि, कैसे काटते हो" अज्ञात


 जिन चिरागों को हवाओं का खौफ नहीं
 उन चिरागों को बुझने से बचाया जाये
 घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
 किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये      "निदा फाजली "

बिल्कुल ठीक कहते हैं निदा फाजली साहेब अब हमारे रोने से
किसी को क्या हासिल ,किया मतलब ,तो अपने रोने से तो
अच्छा है ,कि कुछ ऐसा करो, चाहे दिल मैं हजारों दर्द लिए
किसी जोकर कि तरह मसखरी हरकतों से किसी बच्चे को ही
हसाया जाये ,और उसकी हसीं मैं अपने दिल का सकूं पाया जाये |

बाकि देखने ,सुनने वाला खुद ही जान जायेगा कि हम कैसे हैं ?
और कैसे कट रही है ,कैसे काट रहे हैं |

जैसे हंस राज हंस जी अपने गीत मैं केह रहे है|

दुःख बोल के जे दस्या ते कि दस्या ........सुनिए उनसे...



खुश और सेहतमंद रहें ....मिलते हैं अगले मोड पर जिन्दगी के ... आप का ...अशोक "अकेला"

Saturday, January 22, 2011

एक बात तो पक्की ..............................है |


नमस्कार आप सब को .....................यकीनन प्यार भरा |
पर येह भी बिल्कुल सच है ?

इक तरफ़ा प्यार हमेशा दुःख देता है
                और
इक तरफ़ा विश्वास हमेशा धोखा

अर्ज़ है.
आँख और कान बंद किये
होंट और मुहं को सिये
दिल में हजारों जख्म लिए
हम तो बस यूँ ही जिए

किस किस पे यकीन नही, किया मैने
किस किस को मैने मनाया नही,
मेरी,किस्मत ने ही शुरु से धोखा दिया मुझको
जो मैं ही आज तक किसी को भाया नही।

   अशोक"अकेला"

कुछ ऐसा ही अपना दुखडा सुना रहे है |
मरहूम गायक परवेज़ मेहदी अपनी दर्द भरी 
आवाज़ मैं , तो आयें हमभी उन के दुःख मैं शामिल 
हो कर कुछ अपने और उनके  मन को तसल्ली देने की 
कोशिश करते हैं |
गीत पजाबी भाषा मैं है ,पर न सगीत की कोई भाषा होती है 
और न दर्द की ............तो सुनते हैं |
तब तक खुश और सेहतमंद रहें ..............मिलते है अगले 
मोड पर.......................... सुनें...
.

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