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Sunday, November 15, 2020

आ अब लौट चलें ......

 या मुझको मेरी औकात बता दो
या मुझसे मेरे असूल छीन लो...
-अकेला

 आ अब लौट चलें ......

छोड़ फेसबुक की झूठी रंगीन, फ़रेबी,दुनिया से......... अपने ब्लोगर की आभासी दुनिया में ,...
जहाँ थम्स अप का अंगूठा नही, चापलूसी की टिप्पणी नही दिल से निकले प्यारे अल्फाजों की पुकार है दुलार है और समझाने के लिए प्यार से भरी फटकार भी है....सब अपने हैं न... बस इसी लिए, अपने आभासी परिवार के दुःख सुख के साथी...

आ अब लौट चलें ......

इन सालों में...... कभी कभी बड़ा दिल दुखाया है ...फेसबुक के नकली चेहरों ने, उपर से शहद और नीचे मवाद भरा है , इनकी सोच में , दिखाते कुछ है ,होते कुछ हैं , लिखते कुछ हैं , बोलते कुछ हैं ...उफ़ गन्दी सोच, गन्दी मानसिकता, गंदे बोल....न मैं लिख सकता हूँ , न बता सकता हूँ और न ही सोच सकता हूँ ....अगर आप ने मेसज बॉक्स में इनकी हेल्लो का प्यार से जवाब दे दिया ....तो फिर ये vedio call करेंगे ....पुलिंग....या ...?  कोई फर्क नही पड़ता .....
इन जैसों की सोच में ...फ़र्क तो अच्छों को पड़ता है ..और पड़ रह है ......बस !

आ अब लौट चलें ......

यहाँ तो किसी पड़े लिखे लेखक की ज़रुरत है ,,,जो अपने लफ्ज़ो की चासनी से आप को इस ज़हर का एक घूँट पिला सके.. न न न बस ज़रा सा चखा सके, ज़हर तो ज़हर है , उस से ज्यादा तो आप भी हज़म नही कर पायेगे.....
मेरी समझ से बाहर है...न तो मैं पड़ा लिखा,  न कोई लिखने की समझ, न शब्दों का भण्डार , बड़ी मुश्किल से दस क्लास पास की ,, वो भी कहने को ....पर गलत बात, गलत सोच से तो दिल मेरा भी हर किसी अच्छे इंसान की तरह दुखता है ....हमने वो जमाना देखा ही नही .... मन लुभाने को साफ़  सुथरी फ़िल्में , साफ़  सुथरे गीत पढने को अच्छे लेखक .अच्छी कहानियाँ, आपस का भाई चारा ,बड़ों की इज्ज़त .छोटों को स्नेह सब इकट्ठे कोई लुक्का छिप्पी नही ,लुक्का छिप्पी का खेल ज़रूर होता था......बस वो ही संस्कार मिले हम को ....  
न जी  न  मैं किसी पर लांछन नही लगा रहा ,..न ही मैं इस काबिल ....कमियां ही कमियां है मुझमें भी ..हर इंसान में होती है, वर्ना हम तो भगवान् होते .....अभी भी अच्छे ,सच्चे लोगो से दुनिया भरी पड़ी है, आज की पीढ़ी भी लाजवाब है ....
चंद लोग तो बुरे हर सदी में हुए हैं .और होते रहेगे ..जैसे चाँद में दाग....तो इससे चाँद की कीमत  कम थोड़ी हो जायेगी... दाग़ तो अच्छे लोगों के लिए नज़र पट्टू है ....ऐसे हमारे बुजुर्ग कहते थे ..वो ही मैं कह  रहा हूँ
जो सीखोगे वोही तो बोलोगे .....बस इसी लिए ...फिर भी अगर मेरी कड़वी बातों से किसी का भी दिल दुखा हो तो 
मैं दोनों हाथ जोड़ माफ़ी मांगता हूँ|||
बस! एक बात मान ले मेरी, विनती है...ब्लॉग के भाइयों से, बेटों से, बेटियों से, बहनों से ...चाहे जो रिश्ता बनाएं ...
आ अब लौट चलें ......

खुश रहें,स्वस्थ रहें .... 


  










--अकेला 

Wednesday, March 18, 2020

वक्त है बिसराए हुओ को ....याद करने का ....


आप सब को मेरा प्यार भरा नमस्कार ....☺

क्या आप मेरी इस बात से सहमत हैं .....अपना किया 
बुरा कर्म आप सब से छुपा सकते हैं ...झूठ बोल कर ,वर्गालाकर 
धोखा दे कर, खुद को चालाक समझ कर दुसरे को बेवकूफ समझ कर 
वगेरा...वगेरा ...

पर क्या अपने आप से, अपने दिल से या अपने में बसी अपनी आत्मा से
भी छुपा सकते हैं???....नही न ..

तो फिर क्यों अपनी बुराई न देख, दूसरों की बुराई पर नज़र जाती है...
शायद वो उनकी अपनी नज़र में उनकी अच्छाई हो... 

 "मैं" कौन तेरी बुराई को परखने वाला...."मैं" ने तो अपनी बुराई खुद में छुपा रखी है...और "तेरी" की बुराई ढूंढ रहा है...


पहले "मैं" की बुराई तो परखूँ ..और उस से निजात पाऊं और फिर "तेरी" अच्छाई को हो सकता हैं.... मैं ढूंढ पाऊं ... 

--अकेला 

Sunday, July 01, 2018

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????

ब्लागिंग दिवस पर कुछ अपने मन की.....

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????

काश! मैं भी माँ के आँचल की, छाया में सोता
खूब जी भर खिलखिलाता, फिर कभी खुल के रोता
पर ऐसा हो न सका ....
काश! मेरी भी कोई छोटी, बड़ी, एक बहन होती
फेर सर पे ममता का हाथ मेरे, वो खूब रोती
पर ऐसा हो न सका ....
काश! मेरा भी कोई, भाई तो होता
रख के सर जिसके कंधे पर, मैं खूब रोता
पर ऐसा हो न सका .....
काश! वो दोस्त मेरा, जो आज भी होता
लगा सीने से मुझे, मेरे जख्म धोता
पर ऐसा हो न सका .....
--अशोक'अकेला'
 

Monday, March 26, 2018

जीवन नाम है ...पतझड़ का...

दास्ताँ.... पेड़ से बिछुड़े सूखे पत्ते की
तन से उतरे आत्मा रूपी ...कपड़े लत्ते की ...
-अकेला
जीवन नाम है ...पतझड़ का...
फिर पतझड़ में, पत्ता टूटा
शाख़ से उसका, नाता छुटा,
जब तक था, डाली पे लटका 
न जान को था, कोई भी खटका..

अब कौन करें उसकी रखवाली
रूठ गया जब बगिया का माली..

क्यों सूख के नीचे गिरा मैं 
मैं किसी का क्या लेता था,
धूप में छांव ,गर्मी में हवा
मैं हर राहगीर को देता था..

अब किस पर छांव बनाऊंगा
अब पैरों में, रोंदा मैं जाऊंगा..
 
अब झाड़ू से बुहारा जाऊंगा
फिर मिटटी में मिल जाऊंगा, 
अब पानी में गल जाऊंगा
आग लगी, मैं जल जाऊंगा..

जिस मिट्टी में जन्मा था,
उसी में फिर दब जाऊंगा..

जब बरसे गा, मुझ पे पानी
लौट के मैं, फिर आ जाऊंगा,
यही है जीवन-मरण का नाता
रचे जो इसको, उसको कहते,
कर्ता-धर्ता सब भाग्य-विधाता....

अशोक"अकेला"
 

Saturday, November 11, 2017

मेरे मन के भावों की तुकबंदी ....

मेरे मन के भावों की तुकबंदी ....

मुझे ख़ुदा की ख़ुदाई पसंद है
मुझे आसमां की ऊंचाई पसंद है
 मुझे धरती की चौड़ाई पसंद है
 मुझे समंदर की गहराई पसंद है...

 पहाड़ों की ऊंचाई पसंद है
घाटियों की गहराई पसंद है
 नदी की लम्बाई पसंद है
पहाड़ों के गीत पसंद हैं
झरनों के संगीत पसंद हैं...

 सूरज की उष्णता पसंद है
चाँद की शीतलता पसंद है
 क़ुदरत के नज़ारे पसंद है
 आसमां के तारे पसंद हैं ...

किसानों की बुआई पसंद है
 फसलों की लहराई पसंद है
सुंदर गीतों के बोल पसंद हैं
 गाने वाले लोग पसंद हैं
 धरती के बाशिंदे पसंद हैं
 उड़ने वाले परिंदे पसंद हैं ...

 अच्छों की अच्छाई पसंद है
 कमज़ोर की भलाई पसंद है
 चिड़ियों की चेह्चाहना पसंद हैं
बच्चों की खिलखिलाना पसंद हैं
 नाज़ुक फूलों का माली पसंद है
 अपनी औलाद की खुशहाली पसंद है...

 माँ बाप की दी जिन्दगी पसंद है
 उपर वाले की खामोश बंदगी पसंद है...

 ये सब नेमते बक्शी उस मालिक की
 उसका नाशुक्रा होना, सख्त नापसंद है
मुझे बस... अपनी ज़मीनी हकीक़त पसंद है... 
 -अकेला

Thursday, August 31, 2017

जो गुज़र गया ..वो कल था ...!!!


जो बीत रहा, वो आज है....


जो गुज़र गया वो कल था 
जो बीत रहा वो आज है 
कल मालिक था
वो तख्तो-ताज का 
आज बन गया सिर्फ 
इक दबी आवाज़ है 
वो कल था ,ये आज है ......

कल बहारें थी ,
सपनों का दौर था 
आज वीराने हैं ,
खांसी का शोर है 
वो कल था, ये आज है .....

क्या पापा..आप का 
जमाना और था 
आज हम हैं ..आज का 
ज़माना और है
वो कल था, ये आज है ..... 

मेरे कानों में जब भी 
सुनाई पड़ता है 
मुझ को ये जुमला 
दोहराया लगता है 
वो कल था, ये आज है ....

आँख में थी रौशनी ,
और चेहरे पर नूर था 
घुसा मोतिया आँखों में ,
हो गया चेहरा बे-नूर है 
वो कल था, ये आज है .....

ये जिन्दगी का पहिया बस 
यूँ ही चलता रहेगा 
कल आज में और आज कल में 
बस ढलता रहेगा 
वो कल था, ये आज है .....

कल तक नज़ाकत थी 
बहारें थी, नजारे थे 
जिस तरफ़ प्यार से देखो लो ,
सब हमारे थे 
क्योंकि वो कल था, ये आज है...

खुरदरे हो गये हम ,
वीरान हो गयी बहारें
धुंधला गये नजारे..... 
डाल के माथे पे सिलवट,
जिधर देखें, वो बोलें 
हम न थे कभी तुम्हारे....
क्योंकि वो कल था, ये आज है ....

कल जो  आवाज़ थी वो 
गुज़रे कल की बात थी  
ये जीता-जागता आज है 
आज वो बे-आवाज़ है 
मुस्कराओ ,ख़ुशी मनाओ ,
गुनगुनाओ आज के गीत 
वो कल था, ये आज है ..... 

वो हमारा समाज था 
ये आज का समाज है 
वो कल था, ये आज है .....
-अकेला


Wednesday, July 26, 2017

ये वक्त है....???


ये वक्त है....???

 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम से कराता है
 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम को दिखाता है 
 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम को समझाता है 
ये वक्त है, जो नाकामयाबी पर हम को चिड़ाता है
 ये वक्त है, जो अपनी मर्ज़ी से हम को चलाता है

ये वक्त है, जो हम को गद्दी पर बैठाता है
 ये वक्त है, जो हम को कुर्सी से गिराता है
 ये वक्त है, जो चोटी पर हम को चढ़ाता है
 ये वक्त है, जो हम को गिरा के उठाता है

 ये वक्त है, जो हम को लड़ाता है
 ये वक्त है, जो हम को हराता है
 ये वक्त है, जो रूठों को मनाता है

 ये वक्त है, जो चोट पर मरहम लगाता है
 ये वक्त है, जो एहसान हम पर जताता है 
ये वक्त है, जो चैन की नींद हम को सुलाता है 
 ये वक्त है, जो कुछ भी न करने से घबराता है
 ये वक्त है, जो हम को जीना सिखाता है

 ये वक्त है, जो उम्र हमारी को घटाता है
 ये वक्त है, जो हम को मरने से डराता है
 ये वक्त है, जो चाल अपनी से हम को हराता है
 ये वक्त है, जो अर्थी पर हम को लिटाता है
 ये वक्त है, जो चिता हमारी को सज़ाता है

 ये वक्त है, जो आखिर आग में हम को जलाता है
 ये वक्त है,  छोड़ पीछे सबको आगे निकल जाता     है.......

 ये वक्त है, जो फिर कभी हाथ नही आता है
 सो डर कर रह इस वक्त से हर दम-हर घड़ी 
 न इससे अच्छा कोई दुनियां में,
 न इस वक्त से कोई मुसीबत बड़ी..... 
--अकेला

Friday, July 21, 2017

वक्त.....वक्त की बात है!!!


वक्त.....वक्त की बात है!!!
 वक्त वक्त की बात है
 वक्त क्या क्या दिखलाता है
 वक्त क्या क्या समझाता है
 लड़े-झगड़े गले मिले
 गिले-शिकवे दूर हुए ......

 ये हमारे वक्त की बात है.....
 लड़े- झगड़े गले मिले
 लबों पे मुस्कान
 दिल से दूर हुए....

 ये आज के वक्त की बात है .....

 दुनियां की उलझनों से कर ली मैंने दोस्ती 
इस जिन्दगी के मोड़ आज-तक मेरे न हुए....
--अकेला




#हिंदी_ब्लागिँग


Wednesday, July 05, 2017

कामयाबी की तदबीरें...???

ब्लॉग में लिखने वालों को भी फिर से पढ़ा जाने लगा है 
या जाने लगेगा .....बहुत मंजे हुए ब्लोगरों की मेहनत फिर 
से रंग लाएगी...और हम जैसो की भी सुनी जाएगी ....
इसी उम्मीद पर अपने साधारण से शब्दों में अपने साधारण 
विचार ....आप के सामने ....
ये क्या है ,इसको क्या कहते है ये सब आप जाने ???
जो दिल ने कहा, वो मैंने लिख डाला ....
शुभकामनायें आप सब को |
#हिंदी_ब्लागिँग

कामयाबी की तदबीरें...???

 ढूँढा बहुत मैंने किस्मत में अपनी उन तदबीरों को
 मल मल के देखा मैंने अपनी हाथों की लकीरों को 

 जो लिखा है उसने तेरे लिए वो मिलेगा तुझको ही 
 न नाराज़ हो, इलज़ाम लगा बेकार तू तकदीरों को

 न ले कर गया कोई साथ न ही ले कर तू जाएगा
 सब कुछ धरा रह जायेगा क्या करेगा तू जागीरों को

 सब की मंजिल एक चलने के रास्ते हैं जो चुने हुए
 मिलेंगे सब तुझको वहीं यहाँ क्या पूछे राहगीरों को

 बचपन खेला जवानी कूदी बुढ़ापा चलने से मजबूर हुआ
 बैठा लेट आंसू बहाता देख अपनी ही पुरानी तस्वीरों को

 करता रह कर्म, निबाह के धर्म बाकी सब छोड़ दे उसपे
 ख़ुशी से हो के मस्त कहे 'अकेला' क्यों फ़िक्र हम फकीरों को...
-अकेला 


Sunday, October 23, 2016

टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!

जिन्दगी के टूटे सिरों को 
मैं फिर से जोड़ लेता हूँ, 
ग़मों के बिछोने पर 
ख़ुशी की चादर ओड़ लेता हूँ... 
---अशोक 'अकेला' 

टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!

 अपने हौंसलो से, होड़ लेता हूँ
 मिले महोब्बत, निचोड़ लेता हूँ

 दुनियां के झूठे, रीति-रिवाजो से
 मुस्करा , मुहँ को मोड़ लेता हूँ

 अपने ग़मों के, बिछोने पर
 ख़ुशी की चादर, ओड़ लेता हूँ

 उलझी जिन्दगी, की डोर को 
 हाथ से ख़ुद, तोड़ लेता हूँ

 अब तो आदत, सी हो गई है
 टूटे रिश्तों को, जोड़ लेता हूँ

 ज़माने संग, चल सकता नही अब
 बस 'अकेला' सपनों में, दोड़ लेता हूँ... 

अशोक'अकेला'

Tuesday, February 23, 2016

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????





लगा के बेटियों को, गले से है हँसाया जाता
 न इसके के बदले, कभी भी है रुलाया जाता
 बेटो में देखता बाप, अपने है बचपन की छाया
मिलता बुढ़ापे में सुकून, पा कर है इनका साया.....


मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ???


काश! मैं भी माँ के आँचल की, छाया में सोता 
 खूब जी भर खिलखिलाता, फिर कभी खुल के रोता
 पर ऐसा हो न सका ... 

. काश! मेरी भी कोई छोटी बड़ी, एक बहन होती
 फेर सर पे ममता का हाथ मेरे, वो खूब रोती
 पर ऐसा हो न सका ...

 काश! मेरा भी कोई, जो भाई तो होता
 रख के सर जिसके कंधे पर, मैं खूब रोता 
पर ऐसा हो न सका ...

काश! वो दोस्त मेरा, जो आज भी होता 
 लगा सीने से मुझे, मेरे जख्म धोता

 पर ऐसा हो न सका ..... ????

--अशोक 'अकेला' 

Thursday, February 04, 2016

कितना अब और इंतज़ार करूँ मैं...???


हद हो गई इंतज़ार की ....इधर तो कोई 
झाँक के भी राज़ी नही लगता ...किसी को 
क्या कहें ..यहाँ अपना भी ये ही हाल है ..इधर आते
आते आज छे महीने होने को आ रहे हैं ???पता नही 
क्यों ...पर यहाँ जैसा अपनापन कहीं नही ..यहाँ आ कर 
ऐसा लगता है जैसे भूला भटका शाम को अपने घर आ 
जाये ....और भूला न कहलाये ....
फेस बुक तो है...जब तक आबाद 
ब्लॉग तो रहेगा ..हमेशा ज़िन्दाबाद||
कितना अब और इंतज़ार करूँ मैं...???
 पूछता तो हूँ हमेशा ...फिर बार बार करूँ ....
 आरज़ू है मेरी तेरा ,  मैं 
दीदार करूँ

 तू न मिले मुझसे, मैं 
 इसरार करूँ 

 तू निबाहे न वादा , मैं 
 ऐतबार करूँ 

 तू आये गी अभी, मैं
 इंतज़ार करूँ 

 तू चाहे न करे प्यार, मैं 
 बार-बार करूँ 

 तू उठवाये मुझसे कसमें , मैं
 इकरार करूँ

 अब तो आजा तुझसे, मैं 
 प्यार करूँ

 माने न तू मुझको अपना , मैं
 जाँ निसार करूँ

 आखिर इक अदना सा इंसान , मैं 
 कितनी मनुहार करूँ ..???

अशोक 'अकेला '



Thursday, August 13, 2015

कितना तपाया है...??? जिन्दगी ने..!!!

आज फिर बहुत दिनों के बाद ....
यह मेरे दिल से निकले मेरे अहसास हैं ..
अपने चारों तरफ़ देखे मेरे तजुर्बात है.... 
जो, जैसा मैं महसूस करता हूँ ...
वो,वैसा ही साधारण सा लिख देता हूँ.......
--अशोक'सलूजा'

कितना तपाया है...??? जिन्दगी ने..!!!
 
 क्या बताऊँ कितना तपाया है, जिन्दगी ने
 हर पग पे ठोकर ,तड़पाया है, जिन्दगी ने...

 चंद साँसे न ले सका बैठ के, फुर्सत से 
 कुछ इस तरह से, भगाया है, जिन्दगी ने...

 खुशियों से तारुफ़ नही हुआ, कभी भी मेरा 
 लबों से गीत ग़मों का ,गवाया है, जिन्दगी ने...

 मेरी बातों से न दुखे, कभी किसी का दिल
 अपने उपर ही हँसना, सिखाया है, जिन्दगी ने ...

ओड़ चेहरे पे हंसी ,दुःख दिल में दबा कर
 यहाँ जोकर मुझको, बनाया है, जिन्दगी ने...

जो बनते थे कभी मेरे ,वो सब हुए ग़ैर
 इस तरह से मज़ाक, उड़ाया है, जिन्दगी ने...

 हर वक्त ग़मों से लड़ता रहा, मैं उम्र भर
 सुख-चैन छीन बहुत ,रुलाया है, जिन्दगी ने...

 प्यार छोड़, नफ़रत की खेती लहलहाती हैं 
ये क्यों, कभी न ,समझाया है, जिन्दगी ने...

 दे के मुझको धोखा सुंदर, सुहाने सपनों का
 'अकेला' मुझको ही ,लुटवाया है, जिन्दगी ने...


अशोक'सलूजा'




Monday, May 11, 2015

वकत के साथ क्या.... नही बदलता???

अकेलेपन में चारो तरफ, सन्नाटा है ,खामोशियाँ है
साथ देने को सिर्फ, अपनों की एहसां-फ़रामोशियां हैं .....
--अशोक'अकेला'


वकत के साथ क्या.... नही बदलता???
 वक्त के साथ इंसान बदल जाता है
 वक्त के साथ ईमान बदल जाता है,
 वक्त के साथ शैतान बदल जाता है
 वक्त के साथ भगवान बदल जाता है....

 वक्त के साथ सोच बदल जाती है
 वक्त के साथ विचार बदल जाता है ,
वक्त के साथ समाज बदल जाता है
 वक्त के साथ अंदाज़ बदल जाता है....

 वक्त के साथ अपने बदल जाते हैं
 वक्त के साथ पराये बदल जाते है,
 वक्त के साथ रिश्ते बदल जाते हैं 
 वक्त के साथ चेहरे बदल जाते हैं ....

 वक्त के साथ मकान बदल जाता है
 वक्त के साथ बयाँ बदल जाता है,
 वक्त के साथ मौसम बदल जाता है
 वक्त के साथ आसमां बदल जाता है....

वक्त के साथ औकात बदल जाती है 

वक्त के साथ औलाद बदल जाती है, 
 वक्त के साथ वर्तमान बदल जाता है
 वक्त के साथ भविष्य बदल जाता है....... 

 पर..वक्त के साथ अतीत नही बदलता ??


अशोक'अकेला'


Saturday, February 28, 2015

पुराना,मैं समाचार हूँ !!!!

बहुत वक्त लगा दिया मैंने, ये महसूस करने में,
अब मेरे ज़ज्बातों की कीमत, कुछ भी नही.....
--अशोक'अकेला'
पुराना,मैं समाचार हूँ !!!!
 मैं बीच मझधार हूँ ,
बड़ा ही लाचार हूँ

 कोई न पढ़ें मुझको 
 मैं वो बासी अखबार हूँ 

 कोई न डाले गले मुझको
 मुरझाया फूलों का हार हूँ

 न कोई अब सुनें मुझको 
 पुराना वो मैं समाचार हूँ 

तालाबंधी हो गई जिसकी 
 मैं वो लुटा कारोबार हूँ 

 याद करता हूँ , समय सुहाना 
 भटकता उसमें, मैं बार-बार हूँ

 दोनों हाथों से थामें सर को सोचता,
 मैं क्यों हुआ बेकार हूँ

 जो प्यार लुटाते हैं,अपना मुझ पर
 मैं उनका भी दिल से शुक्रगुजार हूँ

 अब प्यार से पाल रहें ,वो मुझको 
 रहा जिनका मैं कभी पालनहार हूँ

 हंस के कहते है सब ग़म न कर 
 जो है उनमे, वो दिया मैं संस्कार हूँ 

 वो तो हैं, अब भी मेरे सब अपने
 बस मैं ही 'अकेला' अब बेज़ार हूँ |

अशोक'अकेला''



Monday, January 12, 2015

जिन्दगी क्या है .....???

माना ,ज़वानी के अपने ज़ज्बें हैं
पर बुढ़ापे के भी ,अपने तजुर्बें हैं ...... 
 --अशोक'अकेला'
जिन्दगी क्या है .....?

 जिन्दगी क्या है , ग़मों-सुकून का समुंदर
 कामयाबी तैर गयी , नाकामी डूब गयी अंदर

 दूसरों के गिरेबान में झांकता रहा उम्र-भर
 न कभी झाँका ,न देखा अपने दिल के अंदर

 बैठ किनारे पर रहा साहिल से दूर
 किनारा पाया उसी ने जो हुआ न मजबुर

 उम्र सारी काट दी बैठ के इस पार
 काट सका न लहरों की वो धार

 उतरा जो डूब के वो पा गया मोती
 बैठा जो किनारे पे किस्मत रही सोती

 मायूस चेहरे पे छाई रही उदासी
 बैठ किनारे पे जिन्दगी काट दी प्यासी

 न रही उम्र वो न अब बाज़ुओं में ज़ोर है
 कान भी अब पक गए सुन के लहरों का शोर है

 जिन्दगी क्या है , ग़मों-सुकून का समुंदर
 कामयाबी तैर गयी , नाकामी डूब गयी अंदर

 जीवन की रेस में दौडना पड़ता है सभी को
 जो जीतेगा बनेगा वो,ही मुकद्दर का सिकंदर ||

 जिन्दगी क्या है ......?
अशोक'अकेला'

Thursday, August 21, 2014

क्या आपने....? महसूस किया..!!!

बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ ...शायद फिर बहुत दिन 
बाद लिख पाँऊ....जहाँ जा रहा हूँ ,वहाँ इन्टरनेट की 
प्रोब्लम रहती है ....स्वस्थ रहें !

ब्लॉग पर आजकल पतझड़ का मौसम चल रहा है 
पर उम्मीद अभी बाकी है ????

हर पतझड़ के बाद हरियाली आती है 
लगे दिल पे चोट ,सुकूने ख्वाबो-ख्याली आती है ....,
--अशोक'अकेला'

यह मेरे दिल से निकले 
मेरे अहसास हैं ..
अपने चारों तरफ़ देखे
मेरे तजुर्बात है.... 
जो,जैसा मैं महसूस करता हूँ ...
वो,वैसा ही साधारण सा लिख देता हूँ.......





















क्या आपने....? महसूस किया..!!!

जब से बच्चे बड़े हुए , बच्चे समझदार हो गये  
हम बड़े थे ,छोटे हो गये, लो गुनेहगार हो गये,
 
जिन्हें पाला-पोसा था , हमने अपने हाथों से 
वो तो आज हमारे ही, पालन हार हो गये,
  
जो कभी लाडले और आज्ञाकारी थे हमारे,
आज उनके ही हम तो, ताबेदार हो गये,
 
पढ़े-लिखों के आगे हमारे पुराने विचारों का क्या  
न वो समझ पायें हमें, उनके आगे लाचार हो गये,
 
अब तो चलती है उनकी, हम तो सिर्फ़ सुनते हैं
बच्चों के बच्चे भी, हमसे ज्यादा समझदार हो गये ,
   
वो भी सिखाने लगे हैं बहुत कुछ अब हमको 
देखते हैं, उनके अपने ही शिष्टाचार हो गये
 
आज हो गये हम पुराने, बातें भी दकियानूसी  
हम पुराने अखबार के बासी समाचार हो गये,
 
लद गया रामायण, महाभारत और गीता का ज़माना 
आज के बच्चे धूम ३ और कृष के अवतार हो गये,
 
था वक्त हमारे पास, रिश्तों और बजुर्गों के लिए 
आज बच्चों के बच्चे ही, उनके रिश्तेदार हो गये,
.
न देखे सगे-सम्बन्धी ,न दोस्त और न रिश्तेदार 
देखें बंगला गाड़ी, बटुआ वैसे ही व्यवहार हो गये,
    
न रही दिल में इज्ज़त ,न रहा मान-सम्मान  
जैसे हो हेसियत ,वैसे ही अब व्योपार हो गये, 

थे जवां, था काम, होता था नाम, सुबह और शाम
जवानी ढली , बुढ़ापे ने घर बिठाया, बेकार हो गये

जैसी करनी .वैसी भरनी, था क्या हमारा भी ज़माना 
'अकेले' रह गये हम तो आज,  फ़सले-बहार हो गये ... 
अशोक'अकेला'



Monday, June 23, 2014

क़ुदरत की बक्शी...मुस्कुराती यादें !!!

आज लगभग तीन महीने होने को हैं ...जब से एक भी 
पोस्ट नही लिख पाया ...कारण,पिछले काफ़ी दिनों से 
मेरा डेरा धनोल्टी (मसूरी) में था और वहाँ बी.एस.एन एल
इन्टरनेट की अच्छी सुविधा न होने के कारण न चाहते हुए 
भी ऐसा हो गया .. न कुछ लिख सका .न किसी ब्लॉग पर 
आप से रु-ब-रु हो सका ...इसके लिए आप सबसे माफ़ी का 
तलबगार हूँ ..आप सब खुश रहें .स्वस्थ रहें |
वहाँ रहकर जो एहसास मुझे हुआ,जो मेरे दिल ने महसूस 
किया उसे अपने सीधे-सादे लफ़्ज़ों में आप के सामने रख 
रहा हूँ ....
आभार | 
आज भी वो इक सपने सी बात लगती है 
हुई मुद्दतों पहले, कल की बात लगती है....
--अशोक"अकेला" 
करी थी जब हमने बहुत खुल के बातें ,
आज वो भी इक छोटी मुलाकात लगती है 

देखने की चाहत है उस सपने को अब भी  
आज बरसों की लम्बी सी इंतज़ार लगती है 

बंद आँखों से महसूस होता है आज मुझको 
वो मुझे देख मंद-मंद मुस्कुराती सी लगती है 

बदली से निकले बेकरार चाँद जिस तरह 
वो काले गेसुओं से झांकती सी लगती है 

फिर चली दिल में ठंडी झूमती सी हवाएं 
खुशबु झोंकों से उठती बयार सी लगती है

चलो कुछ देर को, दिल को करार तो आया  
जानता हूँ, झूठी नकली सी बहार लगती है 

आज इन फ़िज़ाओं के साथ मिल के लगे है ऐसा 
मैं कभी 'अकेला' न था, कुदरत मेरे साथ चलती है.... 
अशोक'अकेला'


Thursday, March 27, 2014

सिर्फ एक दुआ ...जब तक आप के बीच रहूँ !!!

आज मैं अपने जीवन के, ७२ बसंत पुरे कर चूका हूँ, 
और ७३ वें बसंत में कदम रख रहा हूँ ...
सफ़र कहाँ तक है ,कब तक है ,ये भविष्य के गर्भ में छिपा है ...
आप से सिर्फ एक बात का इच्छुक हूँ, 
आप के स्नेह का ,आप की दुआ का ,
सिर्फ एक दुआ ...जब तक आप के बीच रहूँ !!! 
स्वस्थ रहूँ ..दुआ कीजिये ,दिल से कीजिये |
सब कुछ पाया मैंने आपसे ..देने को सिर्फ 
शुभकामनायें और आशीर्वाद है ....
खुश रहें,स्वस्थ रहें !

क्या से क्या नज़र आता हूँ मैं 
शीशा भी आजकल पूछता है मुझसे ...
--अशोक'अकेला'
अब ....और ...

तब ....
चलो दी फिर दिल ने तसल्ली 
झूठी ही सही ,करार तो आया.... 

दी दिल ने, दिल को तसल्ली 
और दिल को, करार आ गया 

यूँ ही पहुंचे थे, दिल को थामे 
और उनका, दरो-दिवार आ गया 

निकला तो था, वीरानियों में मैं 
और खुशियों का, बाज़ार आ गया 

रह गयी पीछे, धूल भरी आंधियां 
और मौसम, ख़ुशगवार आ गया 

मायूस हो के, उड़ गये परिंदे शाख से 
और अब उनपे, शोख़ी-ख़ुमार आ गया 

छाई अब खुशियाँ ही खुशियाँ, चारो तरफ 
हर तरफ से ये अब, समाचार आ गया 

जो न देखते थे, कभी पलट के मुझको
आज उनको भी, मुझ पे प्यार आ गया ....

----अशोक'अकेला'


Sunday, February 23, 2014

अब मर्ज़ी नही हमारी ... है अब.. वक्त की बारी !!!

अब मर्ज़ी नही हमारी ...
      है अब.. वक्त की बारी !!!
सुना करते थे, जीवन में
 इक दौर ऐसा, भी आता है
 अकेले, पड़े रहोगे कोने में
 झाँकने न कोई आता है...

अब इंतज़ार रहता है हरदम
 घर में किसी के आने का ,
 भूले-भटके ही सही...
 किसी के द्वारा हाल पूछे जाने का..

 जब दिल में दर्द होता है
 तो इक टीस सी उठती है
 चीख तो निकलती नही
 बस सांस सी घुटती है...

 आज सोच मेरी आँखों में
 आ जाती है नमी,
 किसी को अब महसूस
 होती नही मेरी कमी...

 माँ कहतें हैं जिसे काश!
 कि वो मेरी भी होती, 
 मैं भी गिरता आज बन
 किसी आँख का मोती...

 न रहे अब वो यार
 न किसी से यारी है
 कुछ को खा गया वक्त
 कुछ को खाने की तैयारी है...

 दिल के दर्द को.... जाने कौन 
 जिसने सहा.... बाकि सब मौन!!!

अशोक'अकेला'





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