Wednesday, February 13, 2013

"अकेला" का अकेलापन..!!!


"अकेला" का अकेलापन..!!!
 "मुझ को छोड़ दो "अकेला" मैं 'अकेला' रहना चाहता हूँ "

 जब जब यह वाक्य याद आता है
 तब-तब अब मन बहुत घबराता है

 शायद ये सब वक्त-वक्त की बात है
 अब जो अकेलापन बहुत सताता है

 राह तकता हूँ अब सुनी आँखों से
 जब चल के पास कोई न आता है

 सायं सायं जब करता है रात का अँधेरा
 तो अकेलापन आँख से आंसू छलकाता है

 चाहने वाला कभी , हर वो शख्स क्यों
 गुज़रे वक्त के, साथ-साथ बदल जाता है

 खुदी की चाहत से  जब माँगा था अकेलापन
 तो फिर अब ऐ दिल तू क्यों पछताता है

 अब "अकेला" उन यादों को याद करके
 बस अपने अकेलेपन को ही सहलाता है ....


अशोक सलूजा 'अकेला'






51 comments:

  1. अकेलेपन को साथी बना लेने से अकेलापन नहीं रहता है।

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    1. प्रवीण जी ,आप का कहना बिलकुल ठीक है,पर यह आप के लिए ठीक नही होगा :-)
      आभार!

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  2. सलूजा साहब इस पर आपके लिए एक शेर अर्ज करना चाहूँगा ;

    अपने को एक सामर्थ्यहीन ठेला न समझो,
    सिर्फ अतीत के ख्यालों का रेला न समझो,
    जिन्दगी के इस मेले में हम तुम्हारे साथ है,
    सलूजा साहब, खुद को यूं अकेला न समझो !

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    1. नहीं मालूम कि आप मद्यप हैं या नहीं, किन्तु थोड़ा मसखरी का मूड हो रहा है, उम्मीद करता हूँ कि आप इसका बुरा नहीं मानेगे !

      एक भोर की आड़ में लेते हैं, एक संध्या की आड़ में,
      अपुन दो में ही मस्त हो जाते है, दुनिया गई भाड़ में। :)

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    2. भाई जी आप की जिन्दादिली का कायल हूँ मैं ......
      आप के स्नेह का आभार !

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    3. भाई जी ,बुरा कैसा मानना .और वो भी आपका .......
      आप की येही शोखियाँ तो मेरा अकेलापन दूर करती हैं ...
      खुश और स्वस्थ रहें !

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  3. हम तो परचेत जी वाली बात ही दोहराना चाहेंगे. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  4. चाहने वाला कभी , हर वो शख्स क्यों
    गुज़रे वक्त के, साथ-साथ बदल जाता है

    सच है ..... पर अकेलेपन से भी जूझना सीखना होता ही सबको किसी न किसी मोड़ पर

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    1. मोनिका जी, मैंने तो अपना तजुर्बा लिखा है .....
      अकेलेपन से जूझने का समय तो आपके पास है ....जो मैंने गवां दिया !!!
      शुभकामनायें!

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  5. राह तकता हूँ अब सुनी आँखों से
    जब चल के पास कोई न आता है

    बहुत सुंदर रचना,
    सच कहूं तो ऐसी रचनाएं कभी कभी ही पढने को मिलती हैं

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    1. बस अपने तजुर्बे की रचना बन गई .....:-)
      आभार!

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  6. बाह , बहुत सुन्दर .अकेलेपन में ही आदमी को सच्चाई की पहचान होती है।

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  7. सायं सायं जब करता है रात का अँधेरा
    तो अकेलापन आँख से आंसू छलकाता है ..

    अकेलेपन को झेलना आसान नहीं ... आपकी गज़लों से दर्द छलकता है ...
    टीस सी गुज़र जाती है ...

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  8. सायं सायं जब करता है रात का अँधेरा
    तो अकेलापन आँख से आंसू छलकाता है

    चाहने वाला कभी , हर वो शख्स क्यों
    गुज़रे वक्त के, साथ-साथ बदल जाता है
    यह आपकी, हमारी सबकी कहानी है" अकेला" जी,-बहुत सटीक अनुभूति
    Latest post हे माँ वीणा वादिनी शारदे !

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  9. अकेलापन,को क्या समझेगे लोग,,
    क्योकि ,हमें आज दिखते दुकेले है..


    RECENT POST... नवगीत,

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  10. ठंडी हवाएं ,दिलकश फिजायें ,तन्हाई ,और तेरी याद ,
    बड़ा ही दिलकश होता है मेरी तन्हाई का मंज़र।।।।।।।

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  11. आपकी पोस्ट 14 - 02- 2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें ।

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  12. कविता बहुत सुंदर है ....
    संगीत को साथी बना लीजिये अकेलापन दूर भाग जाएगा .....!!

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    1. अनुपमा जी ..बस ऐसे ही दूर भगाता हूँ अपने अकेलेपन को ..यह तो मेरी यादों का सफ़र है |
      आभार!

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  13. शायद इसे ही वक्त का खेल कहते है मगर ज़िंदगी अकेले में भी अकेलेपन के साथ रहना सिखा ही देती है।

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    1. पल्लवी जी . आपने सही समझा है ...जिन्दगी को |
      आभार !

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  14. Replies
    1. संगीता जी ...आपके स्नेह का आभार !

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  15. जो चीज़ पास नहीं होती ... मन उसी के पीछे भागता है ..... :(
    अनुपमा जी से सहमत हूँ .... अकेलेपन में अक्सर ...'संगीत' बहुत अपनेपन से साथ निभाता है ..... :)
    ~सादर!!!

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  16. तुम मेरे पास हो ,जब कोई दूसरा नहीं होता .

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  17. तुम मेरे पास होते हो ,जब कोई दूसरा नहीं होता .

    मुबारक प्रेम दिवस ,अतीत के झरोखों से झांकता ,ताकता प्रेम .

    ReplyDelete
  18. कुछ उदासी और कुछ टीस भरी लेकिन पुरअसर एवं सशक्त अभिव्यक्ति है ! मूड का यह फेज़ भी बीत जाएगा ! किताबें सबसे अच्छी साथी की भूमिका निभाती हैं ! उन्हें अपने पास रखें !

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    1. साधना जी , यह मूड का फेज़ नही ..बुढ़ापे के अकेलेपन का है ...इसे अपने-अपने समय पर अकेले ही बिताना पड़ेगा जैसे मैं अपनी यादों और तजुरबो के संग बीता रहा हूँ !
      आभार !

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  19. अकेलेपन को अपने पर हावी मत होने दीजिये , ये आपकी कलम और उससे निकली हुई रचनाएँ ही तो आपकी साथी हैं और फिर जो किताबों में जीता है वो कभी अकेला नहीं होता उसको बहुत सरे साथी मिल जाते हैं।

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    1. रेखा जी ..आप सही कह रही हैं ..मैं भी यही कर रहा हूँ ..अपनी यादों को रचना में ढाल कर ..
      आभार!

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  20. राह तकता हूँ अब सुनी आँखों से
    जब चल के पास कोई न आता है
    बेहद भावमय करते शब्‍द
    सादर

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    Replies
    1. बहुत-बहुत शुक्रिया सदा जी .....

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  21. सार्थक अभिव्यक्ति ............
    भीड़ में भी तो कभी-कभी हम अकेले होते हैं
    साभार

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    1. हाँ जी ,यह मूड की बात है ...
      आभार!

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  22. बहुत सुन्दर कविता रच दी आपने मन के भाव ही हैं जिन्हें बस शब्दों में ढाल दिया ...मेरी रचना तन्हाई का जैसे ये जवाब हो ..अकेलापन किसी को अच्छा नहीं लगता सर मुझे तो बिलकुल भी नहीं ...मेरी कविता दोबारा पढेंगे तो समझ जायेंगे आप
    ---
    सादर
    ---पारुल

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    Replies
    1. पारुल जी ..यह बुढ़ापे का अकेलापन है जिसे अपने वक्त पर सब को इसका सामना करना है ..आप को मेरा लिखा तजुर्बा अच्छा लगा शुक्रिया !पर अभी आप की उम्र
      में अकेलापन बिलकुल अच्छा नही ...खुश रहिये और मस्त रहिये ....
      जिन्दगी का आनद लें !
      शुभकामनायें!

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    2. सर प्लीज आप मुझे सिर्फ पारुल कहिये मुझे अच्छा लगेगा ..और मेरी नई रचनाएँ आपकी टिपण्णी का इंतजार कर रही हैं लिंक यहाँ दे रही हूं
      --सादर
      http://parulpankhuri.blogspot.in/2013/02/blog-post_19.html

      http://parulpankhuri.blogspot.in/2013/02/blog-post_4266.html

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  23. अकेलापन हमराही है ...इससे गिला कैसा ...बहुत अच्छी कविता

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    Replies
    1. कविता जी,कोई गिला,शिकवा नही ,अपना तजुर्बा बाँट रहा हूँ शायद किसी के समय रहते काम आ जाये ..:-) मुझे तो इसने लिखना सिखा दिया और समय का सदुपयोग भी !
      आभार !

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    2. This comment has been removed by the author.

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  24. इक समय का सुखद अनुभव किसी दूसरे समय में कैसे दुःस्वप्न में बदल जाता है यह रूह कंपा देने वाला अनुभव होता है। फिर भी आप उतने अकेले भी नहीं हैं। आप इतनी रुचि से सुंदर कविताएँ लिखते हैं लोगों की लेखनी को अपने सुंदर शब्दों से निखारते हैं। मुझे इस कविता पर किसी किताब में पढ़ा हुआ एक रोचक वर्णन याद आ गया।

    नरक का दरबार सजा हुआ था, धरती से आए नये नारकीय अपनी सजा सुनने को बेकरार थे। यमराज की एंट्री हुई। उन्होंने देखा सभी कैदी मौन हैं दुखी होकर सजा का फैसला कर रहे हैं बस कुछ लोग ही अलग खड़े होकर डूबकर वार्तालाप कर रहे हैं। यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा, ये लोग कौन हैं इतने नारकीय माहौल में भी कैसे ये इनसे निर्लिप्त हो सकते हैं।

    चित्रगुप्त ने कहा कि ये लोग लेखक अथवा कवि किस्म के प्राणी हैं जहाँ भी जमा होते हैं दिलचस्प महफिल जमा लेते हैं इन्हें स्वर्ग में रखो या नरक में इन्हें फर्क नहीं पड़ता।

    ये किस्सा वर्जीनिया वुल्फ ने गढ़ा था, मुझे लगता है कि आपका अकेलापन अकेला होने के बाद भी विशिष्ट है। अद्भुत है।

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  25. सौरभ भाई ! इतने मान-सम्मान का हक़दार नही हूँ मैं ..पर फिर भी मनुष्य हूँ ,और मनुष्य की फितरत के हिसाब से मुझे भी इस सम्मान से ख़ुशी हुई है, वैसे मैं अपने जीवन से बहुत खुश हूँ ,जो मिला ,जितना मिला ,बहुत मिला ...यह मेरे तजुर्बें हैं ,जो मैं लिख रहाहूँ,शायद किसी के काम आ जाये ...और कभी किसी की ख़ुशी में,मैं भी साझीदार हो जाऊं|
    बस,मनुष्य से एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश में एक कदम और आगे बढ़ जाऊं|
    खुश रहें |
    शुभकामनायें!

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  26. बहुत सटीक अनुभूति खुश रहिये हमेशा

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    Replies
    1. बहुत-बहुत आभार संजय जी ....

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  27. Replies
    1. समीर भाई जी ...आप आ गये तो अकेलापन कैसा |
      आभार!

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  28. निराशा ठीक नहीं भाई जी ...
    सादर

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    Replies
    1. भाई जी .आपके आने से निराशा ..आशा में बदल गई |
      स्नेह के लिए आभार |

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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