Saturday, December 25, 2010

यादों का सफर....................................................

बंदा हाज़िर  है ! अपनी यादों का खज़ाना लिए हुए आप के साथ बाटने को
भले ही आप राज़ी  हो या न हो ? मैंने  भी जीने के लिए किसी के साथ तो
बोलना है | और मेरे को यह  रास्ता बड़ी मुश्किल से मिला है | जिसका मैं
भरपूर इस्तेमाल करना चाहता हूँ और करूँगा | कृपया मान जाएँ न !
बस थोड़ी देर मेरे साथ भी ......................................................नही तो यह
दुआएं देना बंद करो !


" इस उम्र में भी देते है, जीने की दुआ
क्या मेरे गुनाहो की फैरिस्त इतनी लम्बी है॥"

तो फिर आयें चलते है मेरी यादो के सफर पर मेरे साथ ....................


अशोक सलूजा




            बचपन की अनकही यादैं
                         एक 

मुझ को पाला था,पोसा था, बडा प्यार
दिया था मेरी नानी ने,
मुझ को अपने कन्धों पे घुमाया था,
मेरे मामा ने अपनी जवानी में॥
न माँ,न मौसी , न भाई, न बहना, न नाना
थी मेरी नानी,तो बस था एक ही मामा सयाना ॥
पढ़ती थी मुझको भी मार,बचपन में
जिसकी उठती ही मीठी पीड़ अब भी पचपन में॥
पढ़ा था मेरा भी बचपन में,शरारतों से पाला
कभी कभी मुझ को था उन्होने मुसीबत में डाला॥
याद आती मुझ को मार मामा की,याद आती है
सब को नानी ,मुझको तब याद आती थी नाना की॥
कभी कभी थप्पढ़,कभी लातो की मार
छुपा रहता  था , उसमें भी कही मामा का प्यार॥

दो
मामा तो चाहता था, पडना कमज़ोर
मेरा बचपन था, कुछ ज्यादा ही मुहंज़ोर॥
बीच बचाव में जब छुड़ाने  आती थी नानी
तब कुछ ज्यादा ही कर जाता था मैं मनमानी॥
चार आठ दस आने का ज़माना था
सिनेमा देखने का जब कोई बहाना था,
तब लगाता था मस्का मैं अपनी नानी को
किसी तरह पूरी करा लेता था अपनी मनमानी को॥
कभी ऐसा भी हुआ, जो बात न मेरी नानी ने मानी
अपनी हाथ सफा़ई से उन की ज़ेब पर की मनमानी॥
पकडा गया तो हुई मेरी पिटाई भी,फिर कुछ 
न सुनी मामे ने मेरी सफाई भी॥

तीन
फिर भी अच्छे दिन थे वो आज से
खाया पिया खेले और पिटे पर ख़ास थे॥
बचपन से ही मैरा शौक बडा अज़ीब था
मैं सिनेमा और सिनेमा सगींत के करीब था॥
जासूसी नावल, फिल्मी मेग्जीन और अच्छी
किताबो का शौक भी बडा है,
मैने फिल्मफेयर, जेम्स हेडली चेइज़ और
मुन्शी प्रेम चन्द का गौदान भी पढ़ा है॥
शैरो शायरी का भी मुझे शौक है सुनता हूं
खुशी से जो सुनाये कोई अच्छा सा जौ़क है॥
कहीं पे न अटका, जो थौडा सा भटका
तो फिर आ गया अपनी सीधी राहों पे,
अब तो अच्छे कर्मो के लिये निगाह है
अपने खु़दा की निगाहौ पे॥
अब भी मेरे साथ है, मेरा दोस्त,मामा और मेरी नानी
मरते दम तक बुढापे में,अपने दोती दोतों,पोती पोतों को
सुनाउंगा यही खट्टी मीठी मैं अपनी कहानी ॥      अशौक सलूजा
१९ जुलाई २००९.








     

2 comments:


  1. अशोक भाई !
    मेरे ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी पसंद आई , उसे पढ़ कर महसूस हुआ कि कोई अच्छा दोस्त आया है ! आपका ब्लॉग देखकर आशाएं और मज़बूत हुई हैं ! उम्मीद करता हूँ आपसे बहुत कुछ मिलेगा ! शुभकामनायें स्वीकार करें भाई जी !

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  2. लीजिए जी कवितात्मक आत्म कथा ! ये कवि और लेखक होने का बड़ा फायदा है जो भी कहेंगे कविता में कहेंगे.हा हा हा
    अब कैसे हैं ?याडों के सायों की बाहे बहुत लम्बी होती है सखे ! अंत समय तक घेरे रहती है.नही छूट सकते इसके बंधन से.सुखद भी तो है दुःख भरा हो तो एक अलग सुकून देता है अतीत.तो मामा कैसे हैं?बुजुर्ग हो गए होंगे? नानी ??? लिखा साथ है.वाह किस्मत वाले हो.अपने तो ना माँ है ना पापा ,ना सास ना ससुर....यूँ पूरा कुनबा है.पर जब 'ये' नही रहते सब बिखर जाता है.एक जेठ जेठानी है.जिनके सामने मैं आज भी वो ही उन्नीस साल वाली इंदु हूँ.बहुत प्यारे हैं.और........अब आप लोग हैं न् ! हा हा हा बचपन की और शरारते बताना,मजा आता है पढ़ने में.

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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