Friday, March 01, 2013

पत्थर का शहर .....न रात न सहर...!!!

दिखावा बन के रह गयी है जिन्दगी
चेहरे पे झुठी हसीं,और नीचे शर्मिंदगी ॥
----अशोक'अकेला


पत्थर का शहर .....न रात न सहर...!!!
यह शहर है ,पत्थरों का
 यहाँ पत्थर दिल बसते हैं

 यहाँ अहसास के पुतले रोते हैं
 पत्थर के पुतले हँसते हैं

 यहाँ चारो तरफ़ दीवार है पत्थर की
 एहसास के लिए न बचे रस्ते हैं

 यहाँ इमानदारी के चर्चे महंगे हैं
 बईमानी के किस्से सस्ते हैं

 यहाँ अपनों की कोई फ़िक्र नही
 गैरों के लिए हम तरसते हैं

 पत्थर की आँख में पानी कैसा
 आसमां से आँसू बरसते हैं

 अब बड़ों के पैर छूने की रिवायत नही
 "अकेला"  हल्के से हिला सर...समझ !!! नमस्ते है ....

अशोक"अकेला"





26 comments:

  1. बेहतरीन,बेहतरीन बधाई

    ReplyDelete
  2. यहाँ अपनों की कोई फ़िक्र नही
    गैरों के लिए हम तरसते हैं

    हो तो यही रहा है....

    ReplyDelete
  3. दिल बिहीन शहर की सुन्दर चित्रण -बहुत सुन्दर
    latest post मोहन कुछ तो बोलो!
    latest postक्षणिकाएँ

    ReplyDelete
  4. सुन्दर प्रस्तुति
    आभार आपका ||

    ReplyDelete
  5. bahut sundar prastuti ..
    meri nai rachna par bhi pratikriya de
    http://parulpankhuri.blogspot.in/2013/02/blog-post_26.html

    --saabhar

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर रचना
    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  7. यहाँ अपनों की कोई फ़िक्र नही
    गैरों के लिए हम तरसते हैं,,,,लाजबाब,,,

    आजकी यही सच्चाई यही है,,,

    RECENT POST: पिता.

    ReplyDelete
  8. अब बड़ों के पैर छूने की रिवायत नही
    "अकेला" हल्के से हिला सर...समझ !!! नमस्ते है ....
    बहुत सही कहा आपने ...
    सादर

    ReplyDelete
  9. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (2-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  10. सही कहा।
    ये जीवन के नए रस्ते हैं।

    ReplyDelete
  11. साधू साधू | बेहद सुन्दर और भावपूर्ण शब्दों से सजी रचना | बधाई

    यहाँ भी पधारें और लेखन पसंद आने पर अनुसरण करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  12. आज की ब्लॉग बुलेटिन ये कि मैं झूठ बोल्यां मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  13. बढ़िया प्रस्तुति श्री मान जी ...

    ReplyDelete
  14. आजकल के सच का आईना दिखती हुई रचना !
    दुख होता है, हमारी सोच, सभ्यता पता नहीं कहाँ जा रही है.... :(
    ~सादर!!!

    ReplyDelete
  15. बहुत खूब सर .निखार पे है लेखन .


    पत्थर की आँख में पानी कैसा
    आसमां से आँसू बरसते हैं

    अब बड़ों के पैर छूने की रिवायत नही
    "अकेला" हल्के से हिला सर...समझ !!! नमस्ते है ...

    ReplyDelete
  16. बहुत खूब...यथार्थपरक रचना !

    ReplyDelete
  17. बहुत ही प्यारी अभिव्यक्ति..

    ReplyDelete
  18. यहाँ इमानदारी के चर्चे महंगे हैं
    बईमानी के किस्से सस्ते हैं
    जिंदगी की तहें खोल के रख दी हैं ... पर इस पत्थर के शहर में कोई नहीं सुनने वाला आज ... बहुत लाजवाब ...

    ReplyDelete
  19. जैसा दिगंबर जी ने लिखा, कविता की सबसे सुंदर पंक्तियाँ यही हैं, कई बार इच्छा होती है कि इन्हीं सस्ते किस्सों का हिस्सा बन जाऊँ। शायद यह हो भी जाए क्योंकि पत्थर के शहर में कोई नहीं सुनने वाला आज

    ReplyDelete
  20. it's a privilege 2 read u.,.,especially d last 2 lines :)

    ReplyDelete
  21. बिल्कुल सच्चाई बयां करती रचना.

    रामराम.

    ReplyDelete
  22. यहाँ चारो तरफ़ दीवार है पत्थर की
    एहसास के लिए न बचे रस्ते हैं

    ...वाह! आज के कटु सत्य को दर्शाती बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  23. अब बड़ों के पैर छूने की रिवायत नही
    "अकेला" हल्के से हिला सर...समझ !!! नमस्ते है ....

    अत्यंत संवेदनशील और सामयिक, दिल को छू गयी यह रचना.

    ReplyDelete
  24. यहाँ चारो तरफ दीवार है ...

    सत्य है भाई जी !

    ReplyDelete

मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...