Monday, September 23, 2013

यह सोच....फिर चुप सा हो गया हूँ मैं !!!

उनसे प्यार की बात कही नही जाती 
बेरुखी मुझसे उनकी सही नही जाती
---अशोक "अकेला "

यह सोच....फिर चुप सा हो गया हूँ मैं !!! 
 
बहुत देखा,बहुत सुना ,
बहुत सहा,कुछ न कहा
बहुत बहलाया सबको
बहुत फुसलाया सबको  
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं....

न किसी ने देखा 
न किसी ने भाला
न किसी ने समझा 
न किसी ने जाना 
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं.... 

मैं चुप क्यों हूँ 
मैं गुम क्यों हूँ
न किसी ने पूछा
मैं सुन्न क्यों हूँ
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं....

न जवाब कोई भी पाता हूँ 
बेबस हो कर रह जाता हूँ
सब की सुनता हूँ 
ख़ुद को सुनाता हूँ 
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं ....

बिछुड़े हुए उस मीत को 
याद कर अपने अतीत को
दिल को अब हैरानी सी है 
आँखों में अब वीरानी सी है
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं....
 
न अब कोई भी आएगा 
न कभी मुझको मनायेगा
कभी मैं भी था उनका अपना 
न कभी यह अहसास कराएगा
फिर चुप सा हो गया हूँ मैं ....
 
लाख समझाया दिल को
बहुत मनाया दिल को
बहुत भरमाया दिल को 
बहुत सताया दिल को  
फिर चुप  सा हो गया हूँ मैं... 

शायद इस उम्र का असर हो 
आने वाली मंजिल का सफ़र हो
अपने से जब भी सवाल करता हूँ 
पर दिल के जवाब से भी डरता हूँ

ये सोच... फिर चुप सा हो गया हूँ मैं !!!  
अशोक'अकेला'




Friday, September 06, 2013

बड़ा संतुष्ट हूँ .....


बड़ा संतुष्ट हूँ .....
 
मैं अपने जीवन से , इसका
 मुझे अभिमान है ..

कहने को पास कुछ भी नही
 पर सबसे बड़ी दौलत वो पास
 मेरा, स्वाभिमान है ...

क्या रखा है ,दुनिया की इस
 अमीरी में ...

 झूठ,मक्कारी धर्म है, जिस का
 न कोई, ईमान है...

 प्यार से मिल के रहें हम
 सब को सदबुद्धि मिले .मांगू
 उसी से जो हम सब का,
 भगवान् है ....

 आये अकेला. जाये अकेला
 ज़रूरत है जितना ,इकठ्ठा किया 
 उतना ही, सामान है ...

. मैं प्यार बाँटू.मुझे प्यार मिले
 बस इतना सा अपना,
 अरमान है ....

Thursday, August 29, 2013

क्या खबर थी.... लबे इज़हार पे ताले होंगे !!!

वो बातें दिल का ग़ुबार होती हैं
जो बातें बयाँ के बाहर होती है
---अशोक "अकेला "

यादों की गठरी खुली और फिर वो ज़माना 
याद आया ..जब ये गुलाम अली साहब की 
दर्द भरी ग़ज़ल को गाने का मन करता था .....
खूब गुनगुनाया करता था ...जैसे चुपके से कोई 
सन्देश दे रहा हो किसी अपने को ...अपने दिल 
की बात ...दिल का दर्द... बयाँ कर रहा हो !!!

ओह ! पर आज तो मैं आप को अपनी पसंद 
सुनाने जा रहा हूँ ..तब से आप का, क्या लेना-देना ....
उस रास्ते पर चल कर मैं तो उसे अपने पीछे छोड़ 
आया ..आज कोई और उस रास्ते पर चल रहा है...
कल कोई और उस रास्ते पर चलेगा,कभी न कभी,
तो हर शख्स के सामने ये रास्ता  आता ही है..........  

तो आइये मेरे साथ मैं आप को सुनवाता हूँ आज 
अपनी पसंद की ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल .....
सुरों से सजाया है ...ज़नाब गुलाम अली साहब ने.. 
अहसासों से लिखा ....ज़नाब परवेज़ जालंधरी साहब ने..
तो आप भी महसूस कीजिये इस में दिए गये 
किसी के दर्द भरे सन्देश को ......

..
जिनके होंटों पे हंसी ,पाँव में छाले होंगे
हाँ वोही लोग तेरे चाहने वाले होंगे

मय बरसती है फ़िजाओं पे ,नशा तारी है 
मेरे साक़ी ने कहीं ज़ाम उछाले होंगे 

जिनके होंटों पे हंसी ,पाँव में छाले होंगे.......

शमा ले आयें हैं हम, जलवागर जाना से 
अब तो आलम में उजाले ही उजाले होंगे 

जिनके होंटों पे हंसी ,पाँव में छाले होंगे.....

हम बड़े नाज़ से आये थे तेरी महफ़िल में 
क्या खबर थी लबे इज़हार पे ताले होंगे

जिनके होंटों पे हंसी ,पाँव में छाले होंगे.......

जिनके होंटों पे हंसी ,पाँव में छाले होंगे
हाँ वोही लोग तेरे चाहने वाले होंगे.....














उम्मीद करता हूँ , मेरी पसंद ,आप के दिल को 
भी भायी होगी .....
खुश रहें,स्वस्थ रहें!
अशोक सलूजा !


Friday, August 23, 2013

माँ से मुलाकात ......ख़्वाबों में !!!

सोने से पहले, पुकारता हूँ मैं "माँ" 
कितने पवित्र ये, दो शब्द के बोल हैं 
सब दुःख दर्द, ये मेरे हर ले जाएँ 
बोल के परखो, ये इतने अनमोल हैं.... 
अशोक "अकेला"
माँ से मुलाकात ......ख़्वाबों में !!!

 जब कभी मैं, परेशानी में होता हूँ
 मैं माँ की, निगेहबानी में होता हूँ

 सोने से पहले, आँखों को धोता हूँ
 तू आ ख्वाबों में, अब मैं सोता हूँ

 वो सिरहाने मेरे, जागती है रात-भर
 मैं चैन से उसके, आँचल में सोता हूँ

 वो बेचैन हो जाती है, देख के मुझको
 मैं जब कभी डर के, सपनों में रोता हूँ

 ममता से भरा हाथ, फेरती है माथे प
 हंसी उसके लब, मैं मुस्कुरा रहा होता हूँ

 छुपा के सर गोदी में, गुदगुदा के उसको
 झूठी-मुठी रूठी माँ को, मना रहा होता हूँ ....

 काश! मेरी नींद न टूटती उम्र भर ......

अशोक'अकेला'

Saturday, August 03, 2013

उफ़!!! न कर....

मेरी जिन्दगी थी बेआसरा 
तेरे आसरे से पहले .....
--अशोक'अकेला'


उफ़! न कर 
तू अब लब सी ले ...
मिले ग़र ज़हर का प्याला 
आँख मूंद उसे पी ले ...

जिन्दगी में आयेगे 
वो मंज़र भी 
जिसे तू देखना न चाहे 
याद कर बीते 
सुहाने पलों को 
उन पलों में जी ले ...

कट जायेगा दिन 
ढल जाएगी रात 
आयें आँख में आंसू 
कोर होने दे गीले...

कर बिछोना धरती पर 
ओढ़ बादल आसमानी नीले ...
बरसेंगी सुहानी बारिश की बुँदे 
फूल खिलेंगे सरसों के पीले ...

बस उफ़ न कर ,तू अब लब सी ले ........
अशोक'अकेला'


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