Wednesday, May 23, 2012

दिल की भटकन का .....क्या करे कोई ....


गिराई तूने फ़लक से बिजली 
नशेमन मैंने अपना खो डाला 
अदावत तो हमारी आपस की थी 
संग तुने क्यों दूसरों को धो डाला ||
---अकेला
उम्र सारी कट गई
 दर्द की छाँव में
 न धूप निकली
 न जख्म भरे
 कांटे पड़े थे राहों में...

 जिन्दगी के रेगिस्तान में
 चलते-चलते गिरते पड़ते
 पड़ गए छाले भी
 मेरे पाँव में...

 क्यों भटका मैं शहर के
 पथरीले जंगल में
 राहें बुलाती रही मुझे
 मेरे अपने ही गाँव में...

 ढल गयी सांझ जीवन की
 दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
 जा के पीपल की छाँव में...

 वो गांव की कच्ची
 पगडण्डी के धूल भरे रास्ते
 आँखें बिछाए पड़े है
 मेरी राहों में ||
अशोक "अकेला"




35 comments:

  1. क्यों भटका मैं शहर के
    पथरीले जंगल में
    राहें बुलाती रही मुझे
    मेरे अपने ही गाँव में
    भावमय करते शब्‍दों का संगम ... आभार

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  2. ढल गयी सांझ जीवन की
    दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
    जा के पीपल की छाँव में...

    जीवन के इस मुकाम में सिर्फ बीती यादें ही तो बची है, जो रह रह कर याद आती है,....

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

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  3. BAHUT KMAAL KI RACHNA HAI ASHOK JI...BADHAI SWIIKAREN.

    NERAJ

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  4. वाह...

    जिन्दगी के रेगिस्तान में
    चलते-चलते गिरते पड़ते
    पड़ गए छाले भी
    मेरे पाँव में...

    बहुत सुंदर
    सादर,

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  5. अति सुन्दर रचना....
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति....
    :-)

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  6. जीवन के संध्या काल में यह विचार दिल को सकूं पहुंचाता है .
    सुन्दर रचना .

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  7. दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
    जा के पीपल की छाँव में...

    gamvir kawita..badhai..

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  8. क्यों भटका मैं शहर के
    पथरीले जंगल में
    राहें बुलाती रही मुझे
    मेरे अपने ही गाँव में............बहुत.सुन्दर रचना...
    सुन्दर प्रस्तुति.....अशोक जी बधाई..

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  9. न धूप निकली
    न ज़ख्म भरे .... गिला करूँ तो किससे

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  10. ढल गयी सांझ जीवन की
    दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
    जा के पीपल की छाँव में...


    वो गांव की कच्ची
    पगडण्डी के धूल भरे रास्ते
    आँखें बिछाए पड़े है
    मेरी राहों में ||

    वृद्ध मन के कोमल अहसास !

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  11. वो गांव की कच्ची
    पगडण्डी के धूल भरे रास्ते
    आँखें बिछाए पड़े है
    मेरी राहों में द्यद्य

    ‘वो‘ गांव तो अब बस यादों में ही है।
    बहुत अच्छी कविता।

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  12. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 24 -05-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... शीर्षक और चित्र .

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  13. बहुत सुंदर बीती यादों की अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

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  14. आपकी पोस्ट 24/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा - 889:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  15. बहुत सुंदर प्रस्तुति अशोक जी .....
    जीवन मे पीपल की ठंडी छांव ...याद आती ही है ....क्योकि जीवन अपनी जड़ॉं से जुड़ा रहता है ...!!
    शुभकामनायें....!!......

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  16. चर्चा मंच के द्वारा आपके ब्‍लगा पर आना हुआ ।आपकी रचनाऐ दिल को छू गयी ।

    युनिक ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है

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  17. क्यों भटका मैं शहर के
    पथरीले जंगल में
    राहें बुलाती रही मुझे
    मेरे अपने ही गाँव में...

    ..किसी शायर का एक शेर याद आ गया ....
    सिर्फ एक कदम उठा था ग़लत रहे शौक़ में ,
    मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूंढती रही .....

    ......बहुत सुन्दर, दिल को छू गयी आपकी रचना

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  18. बीता समय याद आता ही है।

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  19. दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
    जा के पीपल की छाँव में...


    बहुत खूबसूरती से जीवन के इस पड़ाव पर आपने अपने भाव लिखे हैं ...

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  20. क्यों भटका मैं शहर के
    पथरीले जंगल में
    राहें बुलाती रही मुझे
    मेरे अपने ही गाँव में...

    कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी ... यूं कोई बेवफा नहीं होता ...
    जीवन की आपाधापी में जब समझ आती है तो कई बार देर हो चुकी होती है ...

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  21. गिराई तुने फ़लक से बिजली
    नशेमन मैंने अपना खो डाला
    अदावत तो हमारी आपस की थी
    संग तुने क्यों दूसरों को धो डाला ||
    ---अकेला
    वो गांव की कच्ची
    पगडण्डी के धूल भरे रास्ते
    आँखें बिछाए पड़े है
    मेरी राहों में ||आ अब लौट चलें ,नैन बिछाए ,बाहें पसारे ,तुझको बुलाये देश तेरा ...बहुत ही सशक्त रचना है भाई साहब अब तक आपकी सबसे सशक्त भाव अभि व्यंजना कहा जाएगा इसे बधाई हाँ कृपया ऊपर जो शैर है उसमें 'तूने' कर लें तुने के स्थान पर . .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    23 मई 2012
    ये है बोम्बे मेरी जान (अंतिम भाग )
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    यहाँ भी देखें जरा -
    बेवफाई भी बनती है दिल के दौरों की वजह .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

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  22. क्यों भटका मैं शहर के
    पथरीले जंगल में
    राहें बुलाती रही मुझे
    मेरे अपने ही गाँव में...
    सबकुछ जानते हुए भी भटकन ही चुनते हैं हम..बिडम्बना है.
    बहुत सुन्दर रचना.

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  23. बहुत खूब....
    यादें महत्वपूर्ण हैं ...
    शुभकामनायें भाई जी !

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  24. ढल गयी सांझ जीवन की
    दम ले लूँ मैं भी ज़रा सा
    जा के पीपल की छाँव में...
    बहुत सुंदर
    अब कहाँ वह पीपल की छाँव
    यादों में रह गया है गाँव

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  25. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  26. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  27. सांझ ढले छाँव में सुस्ता लेने का आनंद भरपूर मिले...!
    बेहद सुन्दर कविता !
    सादर!

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  28. बहुत सुन्दर !

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  29. भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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मैं आपके दिए स्नेह का शुक्रगुज़ार हूँ !
आप सब खुश और स्वस्थ रहें ........

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