आज फिर से दाग़ा गया हूँ
शब्द-रूपी जलती मशालों से ,
उभर आये दिल के फफ़ोले
जो दबे पड़े थे सालों से ...
---अकेला
---अकेला
बार-बार भ्रम के जाल में, फंस जाता हूँ
क्यों मैं अपने दिल पे, चोट खाता हूँ
उम्र भर दुखाया दिल को, मैंने अपने
पर बाज़ मैं आज भी, नही आता हूँ
हर दर पे जा-जा खाई, ठोकर मैंने
फिर दौड़ा उसी दर पे, चला आता हूँ
शायद पलट गई हो अब, तक़दीर मेरी
यही आज़माने मैं वापस, चला आता हूँ
हर बार करते हैं वो, बेआबरू मुझको
हर बार मैं वापस, बेआबरू होने आता हूँ
कस्म उठाता हूँ ,अब वापस न आऊंगा
तोड़ देता हूँ कस्म ,वापस चला आता हूँ
जान गये हैं, वो सब भी मुझे अच्छी तरह
मैं बेसहारा ,कब तक "अकेला" रह पाता हूँ....
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| अशोक'अकेला' |






