Sunday, November 15, 2020

आ अब लौट चलें ......

 या मुझको मेरी औकात बता दो
या मुझसे मेरे असूल छीन लो...
-अकेला

 आ अब लौट चलें ......

छोड़ फेसबुक की झूठी रंगीन, फ़रेबी,दुनिया से......... अपने ब्लोगर की आभासी दुनिया में ,...
जहाँ थम्स अप का अंगूठा नही, चापलूसी की टिप्पणी नही दिल से निकले प्यारे अल्फाजों की पुकार है दुलार है और समझाने के लिए प्यार से भरी फटकार भी है....सब अपने हैं न... बस इसी लिए, अपने आभासी परिवार के दुःख सुख के साथी...

आ अब लौट चलें ......

इन सालों में...... कभी कभी बड़ा दिल दुखाया है ...फेसबुक के नकली चेहरों ने, उपर से शहद और नीचे मवाद भरा है , इनकी सोच में , दिखाते कुछ है ,होते कुछ हैं , लिखते कुछ हैं , बोलते कुछ हैं ...उफ़ गन्दी सोच, गन्दी मानसिकता, गंदे बोल....न मैं लिख सकता हूँ , न बता सकता हूँ और न ही सोच सकता हूँ ....अगर आप ने मेसज बॉक्स में इनकी हेल्लो का प्यार से जवाब दे दिया ....तो फिर ये vedio call करेंगे ....पुलिंग....या ...?  कोई फर्क नही पड़ता .....
इन जैसों की सोच में ...फ़र्क तो अच्छों को पड़ता है ..और पड़ रह है ......बस !

आ अब लौट चलें ......

यहाँ तो किसी पड़े लिखे लेखक की ज़रुरत है ,,,जो अपने लफ्ज़ो की चासनी से आप को इस ज़हर का एक घूँट पिला सके.. न न न बस ज़रा सा चखा सके, ज़हर तो ज़हर है , उस से ज्यादा तो आप भी हज़म नही कर पायेगे.....
मेरी समझ से बाहर है...न तो मैं पड़ा लिखा,  न कोई लिखने की समझ, न शब्दों का भण्डार , बड़ी मुश्किल से दस क्लास पास की ,, वो भी कहने को ....पर गलत बात, गलत सोच से तो दिल मेरा भी हर किसी अच्छे इंसान की तरह दुखता है ....हमने वो जमाना देखा ही नही .... मन लुभाने को साफ़  सुथरी फ़िल्में , साफ़  सुथरे गीत पढने को अच्छे लेखक .अच्छी कहानियाँ, आपस का भाई चारा ,बड़ों की इज्ज़त .छोटों को स्नेह सब इकट्ठे कोई लुक्का छिप्पी नही ,लुक्का छिप्पी का खेल ज़रूर होता था......बस वो ही संस्कार मिले हम को ....  
न जी  न  मैं किसी पर लांछन नही लगा रहा ,..न ही मैं इस काबिल ....कमियां ही कमियां है मुझमें भी ..हर इंसान में होती है, वर्ना हम तो भगवान् होते .....अभी भी अच्छे ,सच्चे लोगो से दुनिया भरी पड़ी है, आज की पीढ़ी भी लाजवाब है ....
चंद लोग तो बुरे हर सदी में हुए हैं .और होते रहेगे ..जैसे चाँद में दाग....तो इससे चाँद की कीमत  कम थोड़ी हो जायेगी... दाग़ तो अच्छे लोगों के लिए नज़र पट्टू है ....ऐसे हमारे बुजुर्ग कहते थे ..वो ही मैं कह  रहा हूँ
जो सीखोगे वोही तो बोलोगे .....बस इसी लिए ...फिर भी अगर मेरी कड़वी बातों से किसी का भी दिल दुखा हो तो 
मैं दोनों हाथ जोड़ माफ़ी मांगता हूँ|||
बस! एक बात मान ले मेरी, विनती है...ब्लॉग के भाइयों से, बेटों से, बेटियों से, बहनों से ...चाहे जो रिश्ता बनाएं ...
आ अब लौट चलें ......

खुश रहें,स्वस्थ रहें .... 


  










--अकेला 

Wednesday, March 18, 2020

वक्त है बिसराए हुओ को ....याद करने का ....


आप सब को मेरा प्यार भरा नमस्कार ....☺

क्या आप मेरी इस बात से सहमत हैं .....अपना किया 
बुरा कर्म आप सब से छुपा सकते हैं ...झूठ बोल कर ,वर्गालाकर 
धोखा दे कर, खुद को चालाक समझ कर दुसरे को बेवकूफ समझ कर 
वगेरा...वगेरा ...

पर क्या अपने आप से, अपने दिल से या अपने में बसी अपनी आत्मा से
भी छुपा सकते हैं???....नही न ..

तो फिर क्यों अपनी बुराई न देख, दूसरों की बुराई पर नज़र जाती है...
शायद वो उनकी अपनी नज़र में उनकी अच्छाई हो... 

 "मैं" कौन तेरी बुराई को परखने वाला...."मैं" ने तो अपनी बुराई खुद में छुपा रखी है...और "तेरी" की बुराई ढूंढ रहा है...


पहले "मैं" की बुराई तो परखूँ ..और उस से निजात पाऊं और फिर "तेरी" अच्छाई को हो सकता हैं.... मैं ढूंढ पाऊं ... 

--अकेला 

Tuesday, September 04, 2018

आंखों-देखी दास्तां, श्मशान की ...


आंखों-देखी दास्तां, श्मशान की ...

 अपनों  के साथ, किसी अपने को छोड़ने मैं श्मशान गया
 बड़ा ही परेशान था जिंदगी से वो, जो आज जहाँ से गया

 पहुंचे वहां सब अपने, आखरी रस्मों पर उलझे पड़े थे
कोई अपना, अर्थी पर आंसू बहा रहा था
 कोई अर्थी को, घी लकड़ी से सज़ा रहा था

 कोई इसको मंजिल जिन्दगी की, आख़री समझ रहा था
और कोई बड़ा बुढ़ा बात ये, दूसरों को समझा रहा था
 कोई वहां बैठा, शून्य में अकेले ही बड़बड़ा रहा था
 कोई हाथ की ओट में, मोबाइल पर फुसफुसा रहा था

 कोई जोड़े हाथ, सूनी आंखों में डबडबा रहा था
 कोई चेहरे को अपने, बस ग़मगीन बना रहा था
किसी को कुछ न समझ पाने का, पछतावा था
 और किसी के चेहरे पर बस, सिर्फ़ दिखावा था

 किसी को वहां से, जाने की भी जल्दी थी
 देख घड़ी की सुई, बार बार घबरा रहा था
 माथे पर आई, पसीने की बूंदों को मिटा रहा था
और किसी के, न आने के बहाने बता रहा था

 जवां धूप के चश्में में भी, फैशन दिखा रहा था
बुढापा चलने में, लाठी का संग निभा रहा था

बस ऐसे ही वहां पर, आना जाना लगा था
हम जो चल कर आये थे, अपने दो पैरों पर
 कोई एक आध, चार कंधों पर भी आ रहा था
 वहां पर सब, अपने अपने रिश्ते जता रहे थे
 कुछ रो रहे थे, कुछ ज़ोर से दहाड़े लगा रहे थे

 कैसे हैं ये रिश्ते और कैसे ये नाते
 बड़े-बूढ़े कुछ ऐसा भी समझा रहे थे

 सुलाते थे जो कल तक, रेशमी बिस्तर पर
वो ही आज, लकड़ी का बिस्तर बिछा रहे थे
 बचाते थे, जो कल तक कड़ी धूप से भी उसको
 वो अपने ही आज उसको आग में जला रहे थे

 कुछ है देर में, वो निर्जीव शरीर जल रहा था
जो मिट्टी का था, वो मिट्टी में ढल रहा था
 कुछ चिल्ला रहे थे, तू क्यों हम से नाता तोड़ गया
 सुकून में तो बस वो था, जो सब को रोता छोड़ गया।

 अब सब के वहां से, लौटने की बारी थी
 वो हाथ जोड़ जनता, लाइन में खड़ी सारी थी

 गर्दन झुकाए, जाते जाते सोच रहे थे सब
 क्या हम को भी, कल यही आना पड़ेगा
 आज जा रहे हैं जो हम, दो पैरों पे वापस
 क्या हमें भी चार कंधों पे, वापस आना पड़ेगा

 ये सोचते सोचते, बाहर निकलते ही सब बिखर गये
 बैठ गाड़ी में अपनी, कुछ इधर गए और कुछ उधर गए...

 ये जिंदगी का सफ़र है
 यूं ही बस चलता रहेगा
 यूँ ही कोई आता रहेगा
 यूँ ही कोई जाता रहेगा...
 --अकेला

Sunday, July 01, 2018

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????

ब्लागिंग दिवस पर कुछ अपने मन की.....

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????

काश! मैं भी माँ के आँचल की, छाया में सोता
खूब जी भर खिलखिलाता, फिर कभी खुल के रोता
पर ऐसा हो न सका ....
काश! मेरी भी कोई छोटी, बड़ी, एक बहन होती
फेर सर पे ममता का हाथ मेरे, वो खूब रोती
पर ऐसा हो न सका ....
काश! मेरा भी कोई, भाई तो होता
रख के सर जिसके कंधे पर, मैं खूब रोता
पर ऐसा हो न सका .....
काश! वो दोस्त मेरा, जो आज भी होता
लगा सीने से मुझे, मेरे जख्म धोता
पर ऐसा हो न सका .....
--अशोक'अकेला'
 

Monday, March 26, 2018

जीवन नाम है ...पतझड़ का...

दास्ताँ.... पेड़ से बिछुड़े सूखे पत्ते की
तन से उतरे आत्मा रूपी ...कपड़े लत्ते की ...
-अकेला
जीवन नाम है ...पतझड़ का...
फिर पतझड़ में, पत्ता टूटा
शाख़ से उसका, नाता छुटा,
जब तक था, डाली पे लटका 
न जान को था, कोई भी खटका..

अब कौन करें उसकी रखवाली
रूठ गया जब बगिया का माली..

क्यों सूख के नीचे गिरा मैं 
मैं किसी का क्या लेता था,
धूप में छांव ,गर्मी में हवा
मैं हर राहगीर को देता था..

अब किस पर छांव बनाऊंगा
अब पैरों में, रोंदा मैं जाऊंगा..
 
अब झाड़ू से बुहारा जाऊंगा
फिर मिटटी में मिल जाऊंगा, 
अब पानी में गल जाऊंगा
आग लगी, मैं जल जाऊंगा..

जिस मिट्टी में जन्मा था,
उसी में फिर दब जाऊंगा..

जब बरसे गा, मुझ पे पानी
लौट के मैं, फिर आ जाऊंगा,
यही है जीवन-मरण का नाता
रचे जो इसको, उसको कहते,
कर्ता-धर्ता सब भाग्य-विधाता....

अशोक"अकेला"
 

Saturday, November 11, 2017

मेरे मन के भावों की तुकबंदी ....

मेरे मन के भावों की तुकबंदी ....

मुझे ख़ुदा की ख़ुदाई पसंद है
मुझे आसमां की ऊंचाई पसंद है
 मुझे धरती की चौड़ाई पसंद है
 मुझे समंदर की गहराई पसंद है...

 पहाड़ों की ऊंचाई पसंद है
घाटियों की गहराई पसंद है
 नदी की लम्बाई पसंद है
पहाड़ों के गीत पसंद हैं
झरनों के संगीत पसंद हैं...

 सूरज की उष्णता पसंद है
चाँद की शीतलता पसंद है
 क़ुदरत के नज़ारे पसंद है
 आसमां के तारे पसंद हैं ...

किसानों की बुआई पसंद है
 फसलों की लहराई पसंद है
सुंदर गीतों के बोल पसंद हैं
 गाने वाले लोग पसंद हैं
 धरती के बाशिंदे पसंद हैं
 उड़ने वाले परिंदे पसंद हैं ...

 अच्छों की अच्छाई पसंद है
 कमज़ोर की भलाई पसंद है
 चिड़ियों की चेह्चाहना पसंद हैं
बच्चों की खिलखिलाना पसंद हैं
 नाज़ुक फूलों का माली पसंद है
 अपनी औलाद की खुशहाली पसंद है...

 माँ बाप की दी जिन्दगी पसंद है
 उपर वाले की खामोश बंदगी पसंद है...

 ये सब नेमते बक्शी उस मालिक की
 उसका नाशुक्रा होना, सख्त नापसंद है
मुझे बस... अपनी ज़मीनी हकीक़त पसंद है... 
 -अकेला

Thursday, August 31, 2017

जो गुज़र गया ..वो कल था ...!!!


जो बीत रहा, वो आज है....


जो गुज़र गया वो कल था 
जो बीत रहा वो आज है 
कल मालिक था
वो तख्तो-ताज का 
आज बन गया सिर्फ 
इक दबी आवाज़ है 
वो कल था ,ये आज है ......

कल बहारें थी ,
सपनों का दौर था 
आज वीराने हैं ,
खांसी का शोर है 
वो कल था, ये आज है .....

क्या पापा..आप का 
जमाना और था 
आज हम हैं ..आज का 
ज़माना और है
वो कल था, ये आज है ..... 

मेरे कानों में जब भी 
सुनाई पड़ता है 
मुझ को ये जुमला 
दोहराया लगता है 
वो कल था, ये आज है ....

आँख में थी रौशनी ,
और चेहरे पर नूर था 
घुसा मोतिया आँखों में ,
हो गया चेहरा बे-नूर है 
वो कल था, ये आज है .....

ये जिन्दगी का पहिया बस 
यूँ ही चलता रहेगा 
कल आज में और आज कल में 
बस ढलता रहेगा 
वो कल था, ये आज है .....

कल तक नज़ाकत थी 
बहारें थी, नजारे थे 
जिस तरफ़ प्यार से देखो लो ,
सब हमारे थे 
क्योंकि वो कल था, ये आज है...

खुरदरे हो गये हम ,
वीरान हो गयी बहारें
धुंधला गये नजारे..... 
डाल के माथे पे सिलवट,
जिधर देखें, वो बोलें 
हम न थे कभी तुम्हारे....
क्योंकि वो कल था, ये आज है ....

कल जो  आवाज़ थी वो 
गुज़रे कल की बात थी  
ये जीता-जागता आज है 
आज वो बे-आवाज़ है 
मुस्कराओ ,ख़ुशी मनाओ ,
गुनगुनाओ आज के गीत 
वो कल था, ये आज है ..... 

वो हमारा समाज था 
ये आज का समाज है 
वो कल था, ये आज है .....
-अकेला


Wednesday, July 26, 2017

ये वक्त है....???


ये वक्त है....???

 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम से कराता है
 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम को दिखाता है 
 ये वक्त है, जो बहुत कुछ हम को समझाता है 
ये वक्त है, जो नाकामयाबी पर हम को चिड़ाता है
 ये वक्त है, जो अपनी मर्ज़ी से हम को चलाता है

ये वक्त है, जो हम को गद्दी पर बैठाता है
 ये वक्त है, जो हम को कुर्सी से गिराता है
 ये वक्त है, जो चोटी पर हम को चढ़ाता है
 ये वक्त है, जो हम को गिरा के उठाता है

 ये वक्त है, जो हम को लड़ाता है
 ये वक्त है, जो हम को हराता है
 ये वक्त है, जो रूठों को मनाता है

 ये वक्त है, जो चोट पर मरहम लगाता है
 ये वक्त है, जो एहसान हम पर जताता है 
ये वक्त है, जो चैन की नींद हम को सुलाता है 
 ये वक्त है, जो कुछ भी न करने से घबराता है
 ये वक्त है, जो हम को जीना सिखाता है

 ये वक्त है, जो उम्र हमारी को घटाता है
 ये वक्त है, जो हम को मरने से डराता है
 ये वक्त है, जो चाल अपनी से हम को हराता है
 ये वक्त है, जो अर्थी पर हम को लिटाता है
 ये वक्त है, जो चिता हमारी को सज़ाता है

 ये वक्त है, जो आखिर आग में हम को जलाता है
 ये वक्त है,  छोड़ पीछे सबको आगे निकल जाता     है.......

 ये वक्त है, जो फिर कभी हाथ नही आता है
 सो डर कर रह इस वक्त से हर दम-हर घड़ी 
 न इससे अच्छा कोई दुनियां में,
 न इस वक्त से कोई मुसीबत बड़ी..... 
--अकेला

Friday, July 21, 2017

वक्त.....वक्त की बात है!!!


वक्त.....वक्त की बात है!!!
 वक्त वक्त की बात है
 वक्त क्या क्या दिखलाता है
 वक्त क्या क्या समझाता है
 लड़े-झगड़े गले मिले
 गिले-शिकवे दूर हुए ......

 ये हमारे वक्त की बात है.....
 लड़े- झगड़े गले मिले
 लबों पे मुस्कान
 दिल से दूर हुए....

 ये आज के वक्त की बात है .....

 दुनियां की उलझनों से कर ली मैंने दोस्ती 
इस जिन्दगी के मोड़ आज-तक मेरे न हुए....
--अकेला




#हिंदी_ब्लागिँग


Thursday, July 20, 2017

यादें...: कामयाबी की तदबीरें...???

यादें...: कामयाबी की तदबीरें...???#हिंदी_ब्लागिँग: ब्लॉग में लिखने वालों को भी फिर से पढ़ा जाने लगा है  या जाने लगेगा .....बहुत मंजे हुए ब्लोगरों की मेहनत फिर  से रंग लाएगी...और हम जैसो ...

Wednesday, July 05, 2017

कामयाबी की तदबीरें...???

ब्लॉग में लिखने वालों को भी फिर से पढ़ा जाने लगा है 
या जाने लगेगा .....बहुत मंजे हुए ब्लोगरों की मेहनत फिर 
से रंग लाएगी...और हम जैसो की भी सुनी जाएगी ....
इसी उम्मीद पर अपने साधारण से शब्दों में अपने साधारण 
विचार ....आप के सामने ....
ये क्या है ,इसको क्या कहते है ये सब आप जाने ???
जो दिल ने कहा, वो मैंने लिख डाला ....
शुभकामनायें आप सब को |
#हिंदी_ब्लागिँग

कामयाबी की तदबीरें...???

 ढूँढा बहुत मैंने किस्मत में अपनी उन तदबीरों को
 मल मल के देखा मैंने अपनी हाथों की लकीरों को 

 जो लिखा है उसने तेरे लिए वो मिलेगा तुझको ही 
 न नाराज़ हो, इलज़ाम लगा बेकार तू तकदीरों को

 न ले कर गया कोई साथ न ही ले कर तू जाएगा
 सब कुछ धरा रह जायेगा क्या करेगा तू जागीरों को

 सब की मंजिल एक चलने के रास्ते हैं जो चुने हुए
 मिलेंगे सब तुझको वहीं यहाँ क्या पूछे राहगीरों को

 बचपन खेला जवानी कूदी बुढ़ापा चलने से मजबूर हुआ
 बैठा लेट आंसू बहाता देख अपनी ही पुरानी तस्वीरों को

 करता रह कर्म, निबाह के धर्म बाकी सब छोड़ दे उसपे
 ख़ुशी से हो के मस्त कहे 'अकेला' क्यों फ़िक्र हम फकीरों को...
-अकेला 


Saturday, July 01, 2017

यादें ,वो गर्मी की दोपहरी की ....

ताऊ रामपुरिया जी ....
ताऊ की पहल ...उजड़े चमन को बसाने में ...
मेरी शुभकामनाये ताऊ को इस चमन में नये,पुराने  
फूल खिलाने  में ....

बड़े दिनों के बाद ब्लॉग पर यादें आईं है, गर्मी में 
बीते हुए बचपन की दोपहरी की गर्मियों की....

आप सब से साझा कर बड़ी ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ ....
बस,आप की नज़र चाहिए इस मेरी पोस्ट पर |

फिर कुछ अच्छा,नया सीखने को मिलेगा आप सब से ..
खुश रहें स्वस्थ रहें ..... 
अशोक सलूजा  

यादें ,वो गर्मी की दोपहरी की ....

आज याद आता है फिर यादों में वो गुज़रा प्यारा सा बचपन
वो झुलसती गर्मी, दोपहरी में खिलखिलाता न्यारा सा बचपन

नीम की ठंडी छांव में, पड़ी चारपाई पर, वो बेसुध सा पड़ना 
रुके ग़र हवा, निर्जीव हाथों से, वो हाथ की पंखी का झलना

दिन भर धूल भरी आँधियों का, वो जोर से शांय शायं चलना 
मारना मुहं पे, गर्म हवाओं का  थप्पड़, और अदा से मचलना  

निकर बनियान में, सुने पड़े बाज़ार में, वो मेरा भागते जाना
ठन्डे पानी की चाह में, आने दो आने की, बर्फ का वो लाना

वो तपती तारकोल की सड़को पे, मेरा भागना और चलना 
बर्फ़ से नंगे हाथ का ठिठुरना, नंगे पाँव से पैरों का जलना

वो दौड़ लगाना तेजी से और उधर तेजी से बर्फ का गलना    
था कितना सुहाना वो दोपहरी का, उमस भरी शाम में ढलना
--अशोक'अकेला'
#हिंदी_ब्लागिँग

बचपन और बुढ़ापा 












Sunday, October 23, 2016

टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!

जिन्दगी के टूटे सिरों को 
मैं फिर से जोड़ लेता हूँ, 
ग़मों के बिछोने पर 
ख़ुशी की चादर ओड़ लेता हूँ... 
---अशोक 'अकेला' 

टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!

 अपने हौंसलो से, होड़ लेता हूँ
 मिले महोब्बत, निचोड़ लेता हूँ

 दुनियां के झूठे, रीति-रिवाजो से
 मुस्करा , मुहँ को मोड़ लेता हूँ

 अपने ग़मों के, बिछोने पर
 ख़ुशी की चादर, ओड़ लेता हूँ

 उलझी जिन्दगी, की डोर को 
 हाथ से ख़ुद, तोड़ लेता हूँ

 अब तो आदत, सी हो गई है
 टूटे रिश्तों को, जोड़ लेता हूँ

 ज़माने संग, चल सकता नही अब
 बस 'अकेला' सपनों में, दोड़ लेता हूँ... 

अशोक'अकेला'

Sunday, May 08, 2016

सुना है ...आज माँ दिवस है ???

कहाँ...मेरी है माँ ???
कितना प्यारा था बचपन 
कितना न्यारा था  बचपन
जब प्यारी सी माँ के लिए 
हम सब इक-दूजे से लड़ते थे 
ऊँची आवाज़ में झगड़ते थे 
ये मेरी है माँ ,ये मेरी है माँ 

आज हम भी वही माँ भी वही
बस वो प्यारा, सा बचपन नही
हो गये आज हम सब जवां
वक्त छोड़ गया पीछे निशां
हम आज भी लड़ रहे है 
हम आज भी झगड़ रहे हैं

ले रख ले तू ही, इसे अब रख  
सब एक-दूजे से कहते हैं 
ये तेरी है माँ ,ये तेरी है माँ 
और मैं बचपन से पूछ रहा हूँ 
मुझे भी बताओ ,कहाँ मेरी है माँ ......

--अशोक'अकेला'


Wednesday, April 27, 2016

अंगूठी...में जड़ा वो जादू का पत्थर .....

कौन रखता है याद , गुज़रे वक्त की बात 
ये ही वक्त है यादों का ,गुज़रे वक्त की बातों का.... 
 --अशोक'अकेला'
अंगूठी...में जड़ा वो जादू का
पत्थर .....
मासूम बचपन का सच .....
गली में खेलते हुए किसी से सुना ..किसी के पास जादू की अंगूठी है 
और वो उसमें किसी को भी कुछ भी दिखा सकता है .....

सिर्फ एक आने में .....मुझे भी अपनी माँ को देखने की इच्छा हुई ..
मैंने उसे कभी देखा ही नही था .....मैंने उसको अपना एक आना दिया ..
(जो मेरे दो दिन का बचाया जेब खर्च था )

उसने अपने दोनों हाथों की दिवार मेरी आँखों पर खड़ी करके...और एक टक
उसकी उंगुली और अंगूठे में पकड़ी जादू की अंगूठी की तरफ देखने कहा...
मैंने वैसा ही किया...वो बार-बार पूछ रहा था दिखाई दिया ...और मैं नही ..नही 
बोले जा रहा था ....कुछ दिखे तो हाँ कहूँ.........

एक दम से वो बोला .....जो सच्चे मन से याद करेगा ...और जो अपनी माँ 
को दिल से प्यार करता होगा बस उसे ही दिखाई देगा ..दुसरे को कभी नही .....
 बस.......मुझे एक दम से माँ के दर्शन हो गये...मैं बोल उठा हाँ हाँ माँ दिख गयी...
आप होते तो आप को भी दिख जाता??? .....वो बचपन का जादू !!!! 

 --अशोक'अकेला'

Tuesday, February 23, 2016

मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ????





लगा के बेटियों को, गले से है हँसाया जाता
 न इसके के बदले, कभी भी है रुलाया जाता
 बेटो में देखता बाप, अपने है बचपन की छाया
मिलता बुढ़ापे में सुकून, पा कर है इनका साया.....


मेरी वो आरज़ू......जो हो सकी न पूरी ???


काश! मैं भी माँ के आँचल की, छाया में सोता 
 खूब जी भर खिलखिलाता, फिर कभी खुल के रोता
 पर ऐसा हो न सका ... 

. काश! मेरी भी कोई छोटी बड़ी, एक बहन होती
 फेर सर पे ममता का हाथ मेरे, वो खूब रोती
 पर ऐसा हो न सका ...

 काश! मेरा भी कोई, जो भाई तो होता
 रख के सर जिसके कंधे पर, मैं खूब रोता 
पर ऐसा हो न सका ...

काश! वो दोस्त मेरा, जो आज भी होता 
 लगा सीने से मुझे, मेरे जख्म धोता

 पर ऐसा हो न सका ..... ????

--अशोक 'अकेला' 

Thursday, February 04, 2016

कितना अब और इंतज़ार करूँ मैं...???


हद हो गई इंतज़ार की ....इधर तो कोई 
झाँक के भी राज़ी नही लगता ...किसी को 
क्या कहें ..यहाँ अपना भी ये ही हाल है ..इधर आते
आते आज छे महीने होने को आ रहे हैं ???पता नही 
क्यों ...पर यहाँ जैसा अपनापन कहीं नही ..यहाँ आ कर 
ऐसा लगता है जैसे भूला भटका शाम को अपने घर आ 
जाये ....और भूला न कहलाये ....
फेस बुक तो है...जब तक आबाद 
ब्लॉग तो रहेगा ..हमेशा ज़िन्दाबाद||
कितना अब और इंतज़ार करूँ मैं...???
 पूछता तो हूँ हमेशा ...फिर बार बार करूँ ....
 आरज़ू है मेरी तेरा ,  मैं 
दीदार करूँ

 तू न मिले मुझसे, मैं 
 इसरार करूँ 

 तू निबाहे न वादा , मैं 
 ऐतबार करूँ 

 तू आये गी अभी, मैं
 इंतज़ार करूँ 

 तू चाहे न करे प्यार, मैं 
 बार-बार करूँ 

 तू उठवाये मुझसे कसमें , मैं
 इकरार करूँ

 अब तो आजा तुझसे, मैं 
 प्यार करूँ

 माने न तू मुझको अपना , मैं
 जाँ निसार करूँ

 आखिर इक अदना सा इंसान , मैं 
 कितनी मनुहार करूँ ..???

अशोक 'अकेला '



Thursday, August 13, 2015

कितना तपाया है...??? जिन्दगी ने..!!!

आज फिर बहुत दिनों के बाद ....
यह मेरे दिल से निकले मेरे अहसास हैं ..
अपने चारों तरफ़ देखे मेरे तजुर्बात है.... 
जो, जैसा मैं महसूस करता हूँ ...
वो,वैसा ही साधारण सा लिख देता हूँ.......
--अशोक'सलूजा'

कितना तपाया है...??? जिन्दगी ने..!!!
 
 क्या बताऊँ कितना तपाया है, जिन्दगी ने
 हर पग पे ठोकर ,तड़पाया है, जिन्दगी ने...

 चंद साँसे न ले सका बैठ के, फुर्सत से 
 कुछ इस तरह से, भगाया है, जिन्दगी ने...

 खुशियों से तारुफ़ नही हुआ, कभी भी मेरा 
 लबों से गीत ग़मों का ,गवाया है, जिन्दगी ने...

 मेरी बातों से न दुखे, कभी किसी का दिल
 अपने उपर ही हँसना, सिखाया है, जिन्दगी ने ...

ओड़ चेहरे पे हंसी ,दुःख दिल में दबा कर
 यहाँ जोकर मुझको, बनाया है, जिन्दगी ने...

जो बनते थे कभी मेरे ,वो सब हुए ग़ैर
 इस तरह से मज़ाक, उड़ाया है, जिन्दगी ने...

 हर वक्त ग़मों से लड़ता रहा, मैं उम्र भर
 सुख-चैन छीन बहुत ,रुलाया है, जिन्दगी ने...

 प्यार छोड़, नफ़रत की खेती लहलहाती हैं 
ये क्यों, कभी न ,समझाया है, जिन्दगी ने...

 दे के मुझको धोखा सुंदर, सुहाने सपनों का
 'अकेला' मुझको ही ,लुटवाया है, जिन्दगी ने...


अशोक'सलूजा'




Monday, May 11, 2015

वकत के साथ क्या.... नही बदलता???

अकेलेपन में चारो तरफ, सन्नाटा है ,खामोशियाँ है
साथ देने को सिर्फ, अपनों की एहसां-फ़रामोशियां हैं .....
--अशोक'अकेला'


वकत के साथ क्या.... नही बदलता???
 वक्त के साथ इंसान बदल जाता है
 वक्त के साथ ईमान बदल जाता है,
 वक्त के साथ शैतान बदल जाता है
 वक्त के साथ भगवान बदल जाता है....

 वक्त के साथ सोच बदल जाती है
 वक्त के साथ विचार बदल जाता है ,
वक्त के साथ समाज बदल जाता है
 वक्त के साथ अंदाज़ बदल जाता है....

 वक्त के साथ अपने बदल जाते हैं
 वक्त के साथ पराये बदल जाते है,
 वक्त के साथ रिश्ते बदल जाते हैं 
 वक्त के साथ चेहरे बदल जाते हैं ....

 वक्त के साथ मकान बदल जाता है
 वक्त के साथ बयाँ बदल जाता है,
 वक्त के साथ मौसम बदल जाता है
 वक्त के साथ आसमां बदल जाता है....

वक्त के साथ औकात बदल जाती है 

वक्त के साथ औलाद बदल जाती है, 
 वक्त के साथ वर्तमान बदल जाता है
 वक्त के साथ भविष्य बदल जाता है....... 

 पर..वक्त के साथ अतीत नही बदलता ??


अशोक'अकेला'


Saturday, February 28, 2015

पुराना,मैं समाचार हूँ !!!!

बहुत वक्त लगा दिया मैंने, ये महसूस करने में,
अब मेरे ज़ज्बातों की कीमत, कुछ भी नही.....
--अशोक'अकेला'
पुराना,मैं समाचार हूँ !!!!
 मैं बीच मझधार हूँ ,
बड़ा ही लाचार हूँ

 कोई न पढ़ें मुझको 
 मैं वो बासी अखबार हूँ 

 कोई न डाले गले मुझको
 मुरझाया फूलों का हार हूँ

 न कोई अब सुनें मुझको 
 पुराना वो मैं समाचार हूँ 

तालाबंधी हो गई जिसकी 
 मैं वो लुटा कारोबार हूँ 

 याद करता हूँ , समय सुहाना 
 भटकता उसमें, मैं बार-बार हूँ

 दोनों हाथों से थामें सर को सोचता,
 मैं क्यों हुआ बेकार हूँ

 जो प्यार लुटाते हैं,अपना मुझ पर
 मैं उनका भी दिल से शुक्रगुजार हूँ

 अब प्यार से पाल रहें ,वो मुझको 
 रहा जिनका मैं कभी पालनहार हूँ

 हंस के कहते है सब ग़म न कर 
 जो है उनमे, वो दिया मैं संस्कार हूँ 

 वो तो हैं, अब भी मेरे सब अपने
 बस मैं ही 'अकेला' अब बेज़ार हूँ |

अशोक'अकेला''



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